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Monday, December 5, 2011

पाकिस्तानी का स्वयंवर...?

वीना मलिक 


चैनल इमेजिन पर पाकिस्तान की विवादित मॉडल वीना मलिक के लिए स्वयंवर रचने की  तैयारी की जा रही हैं.  हालांकि यह एक टीआरपी बटोरने का सस्ता तरीका है. जिस्म की नुमाइश करने वाली यह मॉडल पहले ही बिग बॉस में आकर अश्लीलता बिखेरने में कामयाब रही है.  इस बार भी इस रियलिटी शो में वीना मलिक यही करने वाली है. भारत में आकर इस तरह राष्ट्रीय चैनल पर कमाई करना और अश्लीलता परोसने जैसी हरकते असहनीय हैं. 

ऐसा बताया जा रहा है कि इमेजिन की ओर से स्वयंवर-4  के लिए वीना को 4 करोड़ रुपये का ऑफर दिया गया है. इसकी शूटिंग भी भारत से बाहर जाकर मलेशिया में की जा रही है. ऐसा शायद इसलिए किया जा रहा है क्योंकि भारत में रहकर इस शो को पूरा कर पाना मुश्किल है. हालांकि खुद पाकिस्तान भी इस स्वयंवर के खिलाफ है. इस तरह की खिलाफत होना सही भी है. 

सिने एंड टीवी आर्टिस्ट असोसिएशन के अध्यक्ष रज़ा मुराद का यह कहना है- "वीना यहाँ बिजनेस वीजा के तहत आती है. इस वीजा की अवधि 45 दिन की होती है. शर्त यह होती है कि जिस शहर के लिए वर्क परमिट दिया जाता है आप उससे बाहर नहीं जा सकते हैं.फिर उन्हें कैसे प्रतियोगी बना दिया गया है?"    

स्वयंवर तो भारत की संस्कृति का एक हिस्सा है जो कन्या पक्ष द्वारा आयोजित किया जाता था और कन्या को स्वयं अपना वर को चुनने की स्वतंत्रता थी. लेकिन वीना ना तो भारतीय बाला ही है और ना ही इस काबिल कि वह भारत में शादी कर यहाँ रह सके. यह भारतीय संस्कृति की तौहीन ही है जो इस तरह किसी भी  एंटी भारत (पाकिस्तानी) को उठाकर लाया जाए और काम दिया जाए या  अश्लीलता के लिए करोड़ों में खिलाया जाए. 

हर दिन  देश के कोने -कोने से लाखों लोग निकलकर कुछ बनने की चाह में मुंबई में कदम रखते हैं. कईयों की ज़िन्दगी स्ट्रगलिंग एक्टर बने रहकर ही ख़त्म हो जाती है. इसका मतलब यही है कि यहाँ हुनरमंद और मेहनतकशों की कोई कमी नही है उन्हें काम करने का मौका मिलना चाहिए.

अगर इस चैनल को टीआरपी की इतनी चाह और हाथ में इतना पैसा है ही तो क्यों ना वह केबीसी जैसा कोई रियलिटी शो बनाए? ताकि चैनल अपने साथ- साथ औरों का भी भला कर सके. जो भी हो विरोध तो होना ही चाहिए और होगा भी. यदि शो का ज्यादा विरोध हुआ तो इसे बीच में ही अपना ताम- झाम समेटकर खड़े होना पड़ेगा यदि ऐसा नही हुआ तो भी इस शो को विवादों से कोई नही बचा पायेगा.   

Thursday, November 3, 2011

5 करोड़ रुपये की धनराशि


भारत में करोड़पतियों की कोई कमी नही है. एक वक़्त था जब इनकी गिनती मुट्ठी भर लोगों में की जाती थी लेकिन आज कई  भारतियों  की गिनती विश्व के उद्योगपतियों में की जाने लगी हैं. देश ऊंचाइयों को छू आगे निकले तो प्रसन्नता होती है. ऐसी ही एक दिल को छू जाने वाली घटना हाल ही में टीवी पर दिखी. 
बिहार के एक गरीब युवक  ने ' कौन बनेगा करोड़पति  ' से 5 करोड़ रुपये की धनराशि जीती. जी! पेशे से मनरेगा में बतौर कंप्यूटर ऑपरेटर ने जब यह धन राशि जीती भी नही थी तभी उसने उस धनराशि का उपयोग कहाँ करना चाहता है यह बताया. उसका कहना था की यदि वह यहाँ से 5 करोड़ रुपये जीत जाता है तो वह अपने घर की जरूरतों  को पूरा करने के बाद पास के दो बच्चों की मदद करेगा जिनमे उसे प्रतिभा दिखाई देती है. यदि उनपर ध्यान नही दिया गया तो वे किसी चाय या ढाबे पर जाकार काम करेंगे उनका भविष्य यही होगा. 
सुशील कुमार की ऐसी सोच देख अच्छा लगा. खुद सुशील भी हालातों के मारे करोड़ों भारतीयों में से एक चेहरा था जिसने अपनी काबिलियत के दम पर अपना सपना पूरा कर दिखाया. यह सच है के भारत में प्रतिभा ऐसे गाँवों में भरी पड़ी है वहां इनकी अहमियत ना जान उन्हें आगे आने का मौक़ा नही मिल पाता. सुशील कुमार को केवल 5  करोड़ मिले जो उसके जीवन में बड़ा महत्त्व रखते हैं और जैसा पहले भी बताया  है  ऐसा नही है की करोड़ों का मालिक केवल वही है. लेकिन वह इंसान अपने 5  करोड़ को 10  करोड़ बनाने के लालच में नही है जैसा के भारत में हर दूसरा व्यक्ति कर रहा है. आज पैसे का लालच लोगों में इस कदर बढ़ गया है के यदि भीड़ से आगे निकलना है तो वह सामने वाले पर पैर रख कर, कुचलकर ही आगे जाने में विशवास रखता है. सुशील ने हर उस भारतीय के लिए नजीर पेश की है जो खुद पर भरोसा करते हैं. साथ ही उससे लालचियों को भी सीख लेनी चाहिए जो देश के गरीबों के मुंह से निवाला छीन विदेशी बैंकों में जमाखोरी करते हैं. कम से कम अपना पेट भरने के बाद हमे दूसरों यानी अन्य जरुरतमंदों  की सहायता करनी चाहिए जो मानवता का प्रथम कर्त्तव्य भी है.   
     

Thursday, October 27, 2011

दिवाली बनाम प्रदूषण

बड़ी धूम धाम के साथ मनाया जाने  वाला खुशियों का त्यौहार दिवाली हर साल की तरह इस साल भी एक ख़तरा ही  देकर गया. पटाखों के धुंए से इस बार भी दिवाली पर केवल दिल्ली में ही सामान्य से तीन गुना अधिक प्रदूषण फैला. यह सांस और दमे  की बीमारी  को बढ़ावा देने वाला जहरीला धुंआ है. जो हर साल ना जाने कितने लोगों की जानें लील देता है. इन पटाखों  से केवल प्रदूषण का ही खतरा ना होकर दुर्घटना  तथा आर्थिक नुक्सान भी होता है. 
इस बार भी दिवाली के मौके पर कई फेक्टरियों में आग लगी और जान माल का भारी नुक्सान हुआ. गाजीपुर सब्जी मण्डी में  एक पटाखे की दुकान में लगी आग से एक साथ 10 दुकाने जल कर ख़ाक हो गई. इससे पता चलता है कि जहां इन पटाखों को रखा जाता है वो जगह सुरक्षित  नही होती. कम स्थान में अधिक सामान भरने से दुर्घटनाओं का होना तो स्वाभाविक ही है.
ऐसी दुर्घटनाओ से बचने  के लिए सरकार को लाइसेंस के अलावा एक पैमाना तैयार करना होगा कि इकाई के रूप में एक घर को कितने पटाखे दिए जाएँ. आमतौर  पर   देखा जाता है कि धनाड्य वर्ग के  लोग अधिक से अधिक पटाखे जला कर अपने स्टेटस दिखाने  की जुगत में लग जाते हैं. हालांकि वे इससे अपनी सेहत से खिलवाड़ कर बैठते हैं. खुशियों का त्यौहार अगर किसी तरह की चिंता या अशुभता लाये तो सरकार को सचेत हो इनसे सबक लेना चाहिए. अधिक प्रदूषण वाले पटाखों को बैन करे और कम प्रदूषण वाले पटाखों को बढ़ावा देना चाहिए. इस सम्बन्ध में लोगों से कारगर तरीकों से अपील भी की जा सकती है. 

Wednesday, October 26, 2011

फेसबुक का बढ़ता ट्रेंड


आज का युग इंटरनेट का युग है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने आज देश -विदेश  में पूरी तरह से अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। लोगों का अधिकतर समय अब इन्हीं साइट्स पर बीतने लगा है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने हजारों किलोमीटर की दूरीयों को तो जैसे खत्म सा कर दिया है। ट्विटर, माई स्पेस, गूगल प्लस या लिंक्ड इन जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स की फेहरिस्त में फेसबुक सबसे पहले नम्बर पर शुमार है। यह कहना गलत नहीं होगा कि आज आंदोलनों की शुरूआत ही फेसबुक से होती है। मिस्र में सरकार का तख्ता पलट कर देने वाले आंदोलन की शुरूआत भी फेसबुक द्वारा ही की गई थी। वायल गोनिम एक ऑनलाइन कार्यकर्ता ने एक गुमनाम पेज बनाया और लोगों को तहरीर चौक पर इकट्ठा होने की अपील की। यह आंदोलन 250 लोगों की मौत का कारण बनने के बावजूद सफल रहा और ऐतिहासिक भी।
फेसबुक आज एक ट्रेंड  सा बन गया है। फेसबुक के जरिये आज उपयोगकर्ता अपनी व दोस्तों-रिश्तेदारों की फोटो, वीडियो या अन्य बातें सबके साथ सांझा करते हैं। दूर रहने वाले दोस्तों के साथ बातें करने और उनके साथ जुड़े रहने का यह एक ऐसा माध्यम है जिससे हर दिन नये-नये लोग जुड़ रहे हैं। फेसबुक की शुरूआत 4 फरवरी 2004 को हुई। इसे अभी एक दशक भी नहीं हुआ है कि इसके कुल उपयोगकर्ता 750 करोड़ है जिनमें से लगभग 352 करोड़ ऐसे हैं जिनकी उम्र 15 साल से कम है। भारत अमेरिका और इंडोनेशिया के बाद तीसरे नंबर पर आने वाला फेसबुक उपयोगकर्ता है। फेसबुक ने हाल ही में हैदराबाद में अपना एक कार्यालय खोला है। भारत में 32 करोड़ लोग फेसबुक से जुड़े हुए हैं। ८५% उपयोगकर्ता ऐसे हैं जो हर दिन इस पर लॉग इन करते हैं। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि अगले साल तक भारत फेसबुक के लिए अमेरिका के बाद दूसरा सबसे बड़ा बाजार होगा। हालांकि गूगल की ‘गूगल प्लस‘ सोशल नेटवर्किंग सेवा ने इसके कुछ उपयोगकर्ताओं का रुख  अपनी ओर तो किया है लेकिन अब भी फेसबुक ही सबसे आगे है। भारत में फेसबुक का इतने बड़े स्तर पर प्रचलित होने के पीछे कारण यह है कि आज की पीढ़ी स्मार्टफोन हाथ में लेकर पैदा हुई है। लगभग 250 करोड़ युवा मोबाइल से फेसबुक पर लॉग इन करते हैं। एप्पल जैसी कंपनियों ने अब ऐसे फोन निकाले हैं जो बिना इंटरनेट कनेक्शन के फेसबुक तक पहुंच रखने में सक्षम हैं। फेसबुक केवल बातचीत का जरिया न होकर और भी कई भूमिकाएं अदा कर रहा है। इन दिनों फेसबुक एक सशक्त और लोकप्रिय माध्यम बनकर उभरा है जो जनता के विचारों की आवाज बन चुका है। भारत में यह अन्ना की आवाज बनी है तो अमेरीका में ओबामा की। हाल ही में फेसबुक पर अन्ना के आंदोलन के विशाल समर्थन के रूप में देखा जा सकता है। लगभग 3 लाख लोग अन्ना के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन‘ नाम के पेज के साथ फेसबुक पर जुडे़। इससे पहले बीते माह में भी देश में महिलाओं के खिलाफ बढ़ रहे अपराधों के लिए दिल्ली विश्वविध्यालय के छात्र-छात्राओं ने ‘स्लट वॉक‘ निकाला। जिससे फेसबुक पर जानकारी ले दिल्ली के युवा और अन्य लोग जंतर-मंतर पर एक होकर चले। दिल्ली विश्वविध्यालय  के प्रोफेसर रमेश गौतम का मानना है ‘‘आंदोलन आज फेसबुक से शुरू होते हैं। आलोचना का लोकतंत्र भी नए मीडिया से बना है।‘‘ आज समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर लोग लगातार अपनी राय रखते हैं। पिछले कुछ माह तक भूमि अधिग्रहण पर लगातार चली किसानों और सरकार के बीच की लड़ाई में भी लोगों ने फेसबुक पर बहस छेड़कर किसानों का समर्थन किया। इनके अलावा भी फेसबुक पर लोगों ने एक-दूसरे को किसी विशेष मुद्दे या लक्ष्य को लेकर सुयंक्त रूप से जोड़ने के लिए कुछ ऑनलाइन कम्युनिटी और ग्रुप भी बनाए हुए हैं। हाल ही में फेसबुक पर एक ‘हिन्दू स्ट्रगल कमेटी‘ बनाई गई है जो ‘सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा कानून‘ के विरोध में है। इसी तरह एक ही कॉलेज या कंपनी के सहकर्मी, कविताएं या शेरो-शायरी पसंद करने वाले युवा और इनके साथ गैर-सरकारी संस्थाएं भी अपने ग्रुप बनाकर लोगों को जोड़े हुए हैं। जो सभी के बीच संपर्क बनाने का काम करता है। इनसे हटकर देखा जाए तो आज फेसबुक युवाओं को नौकरियां भी दिला रहा है। संभावनाएं देखते हुए बहुत सी कंपनियों ने फेसबुक पर अपने जॉब पेज बनाए हुए हैं। लगभग 15000 जॉब पेजों से 3ण्50 लाख लोग जुड़े हुए हैं। इसके जरिये बहुत से युवाओं को नौकरी मिली है। कई युवाओं को फेसबुक से फ्रीलांसिंग का भी काम मिला है। युवाओं ने अपनी फेसबुक वॉल पर अपने काम से जुड़ी जानकारी दी है जो उन्हें नौकरी के लिए प्रस्ताव दिलाने में मददगार साबित होती है। फेसबुक पर कई कंपनियों ने अपने उत्पादों के विज्ञापन दिए हुए हैं जिससे कम खर्च में अंतर्राष्ट्रीय  स्तर पर ई-मार्केटिंग में भी बढ़ोत्तरी हुई है। फेसबुक उभरते हुए लेखकों के लिए एक मंच बन चुका है जो पुस्तक के विमोचन से पहले पुस्तक का कुछ अंश पाठकों की नजरों में लाने के लिए सहायक है। अब सरकारी निकायों ने अपने काम को मुस्तैदी के साथ करने के लिए खुद को फेसबुक से जोड़ लिया है। दिल्ली नगर निगम और दिल्ली पुलिस और ट्रेफिक पुलिस ने फेसबुक पर लोगों की समस्याओं का निवारण भी किया है। ऐसा बताया जा रहा है जल्दी ही रेलवे विभाग भी फेसबुक पर शिरकत करेगा।
जहां फेसबुक एक ओर लोगों के बीच सेतु का काम कर रही है वहीं दूसरी ओर फेसबुक लोगों को भटकाव की ओर भी लेकर जा रहा है। आजकल फेसबुक पर कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा फर्जी अकाउंट बनाए जाते हैं। लंदन में हो रहे दंगों की शुरुआत का कारण भी फेसबुक ही था। लंदन के ही दो युवको ने फेसबुक पर अकाउंट बनाकर लोगों को आगजनी और लूटपाट के लिए उकसाया। कुछ झूठे अकाउंट ऐसे होते हैं जो किसी बड़ी शख्सियत के नाम पर होते हैं। हाल ही में, फेसबुक पर ब्रिटेन की मशहूर पॉप सिंगर लेडी गागा की मौत की अफवाह उड़ाई गई जिससे लोगों में अफरा-तफरी मच गई। इससे पहले भी फेसबुक से बहुत से विवादों का झमेला रहा है। पिछले साल 2010 में पाकिस्तान में फेसबुक पर बैन लगा दिया गया क्योंकि फेसबुक पर एक प्रतियोगिता आयोजित की गई थी कि लोग अपने तरीके से पैगंबर मोहम्मद की पेंटिंग बनाएं। पाकिस्तान में लगातार विरोध प्रदर्शन के बाद फेसबुक को बैन कर दिया गया। चीन में भी कम्युनिस्ट पार्टी ने फेसबुक बैन किया हुआ है ताकि लोग एक-दूसरे से न जुड़ पाए।    
जिन देशों में फेसबुक है वहां उपयोगकर्ता की लापरवाही के कारण फेसबुक पर कई हैकर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज पासवर्ड चोरी कर लेते हैं। फेसबुक का सबसे बड़ा खतरा है कि इस पर उपयोगकर्ता की निजी जानकारियों तक कोई भी पहुंच सकता है और गलत फायदा उठा सकता है। कंपनियां अपने विज्ञापन के साथ कुछ जानकारियां भी डालती हैं जिससे कई बार कंपनी के डाटा हैक कर लिए जाते हैं। इससे बचने के लिए फेसबुक से लगातार जुड़ते लोगों को इसके उपयोग करने से पहले इसकी पूर्ण जानकारी रखना आवश्यक हो गया है।                                  

Sunday, October 23, 2011

सताता है नॉस्टेल्जिया

मेरे एक पत्रकार मित्र हैं.अक्सर साथ बैठकर यहाँ -वहां की बातें  होती रहती हैं. एक दिन यूँ ही बातों -बातों में कुछ इस तरह की बातें शुरू हुईं कि मुझे उस पर कुछ लिखने की उसे समझने की इच्छा हुई. शायद दिल्ली में रहने के कारण मेरा उन मनोभावों को समझ पाना बड़ा मुश्किल सा है. मेरे जिस मित्र की बात मै आपको बता रही हूँ काशी यानी शिव की नगरी से दिल्ली में पत्रकार हैं. हर एक इंसान की तरह उन्हें भी अपनी मातृभूमि से बड़ा  प्रेम है. मैंने एक दिन काशीदर्शन करने की इच्छा जाहिर की. अधिक उत्सुकता में डूबकर उन्होंने गूगल से मुझे सारी जानकारी परोसने  की कोशिश शुरू कर दी .साथ ही काशी व्याख्यान भी देते गए. उनकी वो उत्सुकता देख मेरे मन में विचार आया. हम जिस भूमि (दिल्ली) पर रहते हैं वहां आपका परिवार भी साथ है. हर दिन आप अपना काम ख़त्म करके घर लौट आते हैं शाम अपने परिवार के साथ बिताकर थकान उतार सकते हैं. इसी भूमि पर  पर कुछ और लोग भी रहते हैं लेकिन अपने परिवार से दूर.........मीलों दूर. वे एक दिन की छुट्टी ले ना तो परिवार से मिल सकते हैं और न ही लौट सकते हैं.
इसी तरह और न जाने इस बड़े शहर में कितने लोगों को परिवार का नॉस्टेल्जिया सता रहा है. अपनी प्रतिभा साथ लिए दूर आकर बस गए हैं. उन्हें उनकी राखी कलाइयों पर नहीं लिफाफों में बंद मिलती हैं.उनके साथ मजबूरी है के छोटे शहरों में अवसर नही मिल पाते, उस तरह के विकल्प नही मिल पाते जो उन्हें यहाँ रहकर पाते हैं.शायद हर कदम पर इनके साथ-साथ एक कहावत इनका पीछा करती चलती है जहां आप कुछ पा रहे हो वहां कुछ खो रहे हो.............यही एक कारण बना है की शहरों में खालीपन अकेलापन बढ़ने लगा है. युवाओं में डिप्रेशन की समस्या पैदा हो गई हैं.जहां सूचना क्रांति से लोगों की दूरी घटी हैं वहीँ मध्यम वर्ग के परिवारों  दूरियां कम हुईं हैं पर ख़त्म नहीं.यहाँ यह समझना भी जरूरी है के हमे कुछ समय बाद यानी दशकों के बाद जब हम किसी स्थायित्व को अपना लें अपनी अपनी भूमि पर लौट जाना चाहिए. जो भूमि हमारी है.जिस पर हमने जन्म लिया.वही हमें बार-बार बुलाती है.

Monday, April 11, 2011

आमजन का 'जन लोकपाल बिल'

देश को चाहिए और कई अन्ना
 एक बूढा आदमी  है मुल्क  में या यों कहो
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है...
आज ये  पंक्तियाँ अन्ना हजारे के लिए खरी साबित हो रही हैं। अन्ना हजारे जिस तरह देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल की मांग को लेकर खड़े हुए और और उनके पीछे जनसैलाब चलता चला गया। अन्ना को अपने आमरण उपवास पर बैठने से  पहले तक भी यह नही पता था कि  हजारों लोगों का गुस्सा उनके साथ लावे की  तरह पीछे चलेगा और आवाज़ उठायगा।
भ्रष्टाचार से आजिज़ हो चुकी जनता के लिए अन्ना एक आदर्श बन गए। 98  घंटे चले इस आन्दोलन में हर घंटे नए- नए लोग जुड़ते चले गए। लोगों ने अन्ना से प्रभावित होकर उन्हें देश के दूसरे गांधी का नाम दे दिया।  हालांकि गांधी और उनमे कई असमानताएं हैं।
जनता को अब यह समझ आ चुका है कि और इंतज़ार नही किया जा सकता अगर आज कुछ नही किया गया तो देर हो जायगी, भविष्य खतरे में पड़ जायगा। वहीँ मीडिया ने भी इस आन्दोलन को चरम तक पहुंचाने में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मीडिया की और से जो आवाज़ आई वो यही थी कि-
हो गई है पीर पर्वत सी अब पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए....
यही कारण रहा  कि इस मुहीम में लोग दूर-दूर से अपना समर्थन देने आये और लगभग 160  लोगों ने अन्ना के साथ व्रत रखा। जंतर- मंतर पर शुरू हुई इस मुहीम में सबसे सुखद बात यह रही कि यहाँ किसी भी नेता या राजनेता को शामिल नही होने दिया गया। अन्ना की इस कवायद में साथ देने बोलीवुड की कई बड़ी हस्तियाँ, स्कूल -कोलेज के छात्र-छात्राएं और कई परिवार भी आये। अब तक यह माना जाता था कि नई  पीढ़ी या आम आदमी अपने घर से दफ्तर और दफ्तर से घर की निजी ज़िन्दगी में ही व्यस्त है। उसके पास देश के बारे में सोचने का वक़्त नही है। लेकिन अन्ना के साथ कदम मिलाते इन लोगों ने ये सब भ्रम दूर कर दिए।

छोटा पड़ता जंतर मंतर और बड़ा होता आन्दोलन देखकर सरकार को झुकना पड़ा।  सरकार ने मानसून सत्र तक  लोकपाल बिल पास करने का वायदा कर तो दिया लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि यह पूर्णतया पाक- साफ़ होगा? दर इस बात का है कि देश को लगा घुन लगा यानी वही मौकापरस्त लोग  इसे भी भ्रष्ट ना कर दें .