Monday, May 28, 2012

``कसूर नहीं था इनका``


कल एक अजीब सी बात हुई
अपनी ही धुन में चली जा रही थी
कोई आया या पता नहीं मैं ही गई...
बस हम टकरा गए
एक फिल्मी सा सीन था कि
पहले वो संभल गए
और थाम लिया अपनी बाहों में
आ गए इतने करीब जो
सांसें भी सुन सकें...
नज़र भर देखा
अभी भी थामे हुए हैं
शायद
मैं ही इस आगोश में हूं
अचानक!
कानों में कुछ आवाजों पड़ीं
`` अरे भाई, अब तो चलो...``
दो होने लगी अब वो
चार होती सी आंखें
अपने पैरों पर खड़े होकर
``कसूर नहीं था इनका``
मैं मुस्कुराई...
और चली आई!!
(दौड़कर मैट्रो की भीड़ में छिप गई)

 


Friday, May 18, 2012

आखिर कहां है शिक्षा का ....... अधिकार ?



पिछले दिनों मुंबई शहर में चौपाटी, मरीन ड्राइव की शाम को करीब से देखने का मौका मिला। कुछ देर टहलने के बाद समन्दर से आती ठण्डी हवा मे कुछ देर के लिये मैं और मेरी मित्र बैठ गये।
किनारे पर जरा बैठने पर ही आसपास के छोटे-मोटे हॉकर्स ने अपना काम शुरू  कर दिया जिनसे हम किसी न किसी तरह पीछा छुड़ाते जा रहे थे। इन्हीं के बीच में से दौड़ती हुई सात साल की कविता हमारे पास आकर बैठ गई।
कविता के हाथ में कुछ रंग -बिरंगे धागे थे और गले में लटकी टोकरी में अक्षर लिखे ढ़ेर सारे मोती। उसकी मुस्कराहट में एक अलग सी बात थी।
इन मोतियों को पिरोकर नाम लिखकर बेचने का काम करती है कविता। उसका छोटा भाई और मां भी घूम-घूम कर यही काम करते है।
कविता कभी स्कूल नहीं गई लेकिन उसे किसी का नाम लिखने के लिए अक्षर बताओं तो वह आसानी से ढ़ूंढ लेती है। मैंने उससे पूछा कि जब तुम कभी स्कूल नहीं गई तो अक्षरों को कैसे..........?
फिर उसने अपनी प्यारी सी मुस्कुराहट के साथ हमारी तरफ देखा और बताया कि मैं इस काम को करते-करते इन्हें पहचानना सीख गई हूं।
टहलते हुए ऐसी कई और कविताएं और उसके छोटे भाई दिखे। छोटी उम्र में इन बच्चों के नाजुक कंधों पर परिवार की जरूरतों को पूरा करने का बोझ लादा जा रहा है।
गौरतलब है कि महाराष्ट्र में 12वीं तक बालिकाओं के लिए मुफ्त शिक्षा  उपलब्ध कराई जा रही है। यह सच है कि जहां एक ओर बच्चे का कामयाब बनाने का श्रेय माता-पिता को जाता है तो वहीं दूसरी ओर बच्चे को गुमनामी और शिक्षा के अंधेरे में धकेलने के जिम्मेदार भी माता-पिता ही है।
1 अप्रैल को बच्चों के मुफ्त तथा अनिवार्य षिक्षा के अधिकार कानून,2009 (आरटीई,2009) को लागू हुए दो साल पूरे हो चुके हैं। इस अवसर पर बच्चों के अधिकारों के लिये 30 गैर-सरकारी संगठनों के अम्ब्रैला(छतरी) संगठन क्राई ने एक रिपोर्ट तैयार की है जिससे यह स्पष्ट है कि अभी भी देश में इस अधिकार के लिये काफी चुनौतियां सामने मुंह बाए खड़ी हैं। 
2011 की राष्ट्रीय वार्षिक  स्तर की रिपोर्ट के आंकडों के अनुसार लगभग 50 फीसदी सरकारी स्कूल ऐसे हैं जिनमें लड़कियों के लिये अलग से षौचालय नहीं है। स्कूलों में का गुणवत्ता स्तर भी कुछ नहीं है। एक-तिहाई स्कूल ऐसे है जिनमें लाइब्रेरी और मैदान नहीं है। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले चौथी कक्षा के छात्र पहली कक्षा के सवालों को भी हल नहीं कर पाते हैं। ठीक से वर्णमाला नहीं पहचान पाते हैं। इसे देख पता चलता है कि देष में एक ऐसे षिक्षित फौज तैयार की जा रही है जो आगे चलकर अषिक्षित ही कहलाने वाली है।
भारत सरकार को शिक्षा के अधिकार को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए कारगर कदम उठाने चाहिए थे लेकिन अभी तक इनमें परिपक्वता की कमी है। ऐसे में जरूरी है कि सरकार अपना ध्यान समाज के उस हिस्से पर केन्द्रीत करें जो अभी तक शिक्षा  से अछूता है।
हालांकि सर्वशिक्षा अभियान समाज में कुछ हद तक षिक्षा के द्वार खोले हैं लेकिन अभी भी स्थिति असंतोषजनक बनी हुई है। देश में 115 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो अपनी प्राथमिक कक्षाओं में पढने के लिये भी स्कूल तक नहीं जाते हैं। जिनके माता-पिता अभी भी पढ़ाई के महत्व से अनजान बने हुए है।  


Thursday, May 17, 2012

चोरी सूचनाओं की भी होती है...




आज न्यू मीडिया के रूप में हमारे सामने सोशल नेटवर्किंग साइट्स (फेसबुक, माइस्पेस, ट्विटर, ऑरकुट, फ्रेंडस्टर), विकीपीडिया और ब्लॉग और बहुत कुछ दिखाई देता हैं। हालांकि, इस डिजिटल दुनिया का कोई दायरा नहीं है। 
नए ज़माने के इस मीडिया के बीच सूचनाओं में क्रिएटिविटी, शेयरिंग यानी ऑनलाइन लेन-देन और एक के बाद दूसरे क्लिक से होकर गुजरने में सूचनाओं और व्यक्ति की निजता की गोपनीयता यानी ‘सोशल आइडेंटिटी‘ खत्म होती जा रही है। जिसकी जानकारी लोगों में नहीं होती। 
जिन टूल्स के प्रयोग से सोशल मीडिया का इस्तेमाल इतना आसान बना है वहीं दूसरी ओर उसी आसानी के साथ उनका दुरूपयोग भी किया जा रहा है। सोशल नेटवर्किंग साइटों का इस्तेमाल करने वाले करोड़ों लोगों की ‘आइडेंटिटी थेफ्ट‘ का खतरा बना हुआ है।  
सोशल नेटवर्किंग साइटों के उपयोगकर्ताओं में हर उम्र वर्ग के लोग शामिल हैं। जो बेधड़क उसका इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी वजह से देश में आज आईटी सिक्योरिटी एक चिंता का विषय बना हुआ है। जिसका एक हालिया उदाहरण अभिषेक मनु सिंघवी के रूप में सबके सामने आया। जिसे संभाल पाना भी मुश्किल दिख रहा था।
आजकल किसी भी व्यक्ति के शौक, आदतें, पसंद-नापसंद और प्रोफेश्नल अनुभवों के बारे में जानकारी लेना कोई मुश्किल भरा काम नहीं रह गया है।  
सोशल नेटवर्किंग साइट्स के प्रोफाइल पेज पर कुछ उपयोगकर्ता बेवजह अपनी निजी जानकारी को सार्वजनिक कर देते है। जिनमें अपने घर का पता, जन्मतिथि, भाई-बहनों या रिश्तेदारों के नाम, फोन नम्बर, दोस्त, अपने निजी संबंध या उनसे जुड़ी फोटो न जाने क्या-क्या।
डिजिटल दुनिया के ऐसे उपयोगकर्ताओं में सबसे बड़ी संख्या किशोरों और युवाओं की है जो खुद को ज्यादा से ज्यादा उजागर करने की जुगत में लगे रहना चाहते हैं। यही उन्हें एक मुसीबत में फंसा देने के लिए काफी होता है। ये जानकारियां जाने-अनजाने उन हाथों में पहुंच जाती हैं जो भविष्य में खतरा पैदा कर सकती हैं।  
इस तरह की व्यक्तिगत जानकारियों केे डिजिटल दुनिया पर सार्वजनिक होने के बावजूद हर सोशल नेटवर्किंग साइट अलने उपयोगकर्ताओं को अपनी प्राइवेसी सेटिंग्स भी रखते हैं। लेकिन इनका प्रयोग बहुत ही कम उपयोगकर्ता करते हैं। दरअसल, व्यक्ति उन सेटिंग्स को समझना फिर उनका इस्तेमाल करना जरूरी नहीं समझते हैं।
आज जहां ऑनलाइन खरीदारी से एक खरीदार का जीवन आसान हुआ है वहीं गोपनीयता और निजता का सबसे बड़ा खतरा इन्हीं खरीदारोें के लिए पैदा हो गया है। कोई भी थर्ड पार्टी यानी अन्य व्यक्ति उपयोगकर्ता के कार्ड या उसके नम्बर तक आसानी से पहुंचकर हैक कर लेता है। जिसका पता तक नहीं चलता और लुटने वाला बैठे बिठाए लुट जाता है। 
हाल ही में, डिजिटल दुनिया से होने वाले खतरों के बारे मे जानकारी के लिए यूरो आरएसजीसी ने भारत समेत 19 देशों के इंटरनेट उपभोक्ताओं पर एक सर्वे किया। इस सर्वे के मुताबिक, डिजिटल क्रांति ने लोगों की निजता को लगभग खत्म-सा कर दिया है। 
19 देशों के इन सभी लोगों की सबसे बड़ी चिंता ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर थी। इनमें से 60 फीसदी लोगों का कहना था कि सोशल मीडिया पर निजी जानकारियां देना गलत है। 
बहुत से लोग ऐसेे भी होते हैं जो साइट पर सार्वजनिक तौर पर सूचना देने के बाद पछताते हैं। क्योंकि जो भी व्यक्ति अपने प्रोफाइल पर कोई भी सूचना डालता है उसे और उन पर हुए कमेंट को निजी रखना चाहता है।
पर, सच तो सह है कि जब डिजिटल दुनिया में कोई जानकारी एक बार पब्लिश हो जाती है तो उसका दूसरा चरण सार्वजनिक होना ही है।
यदि उपयोगकर्ता अपनी कोई सूचना या फोटो आदि को साइट पर डालकर उसे डिलीट कर भी देता है तो भी वो  कहीं ना कहीं इंटरनेट के जाल में रह जाती है जिसकी जानकारी किसी को नहीं होती। 
हाल ही में एक नाबालिग लड़की की कुछ फोटो उसकी सोशल नेटवर्किंग साइट से चुराकर उसे ग़लत जगह इस्तेमाल कर दिया गया था। जिससे पुलिस भी काफी मशक्कत करने के बाद उस अपराधी तक पहुंच पाई। यह कोई पहला ऐसा वाक्या नहीं था जिसमें ऐसी बात सामने आई हो। इससे पहले भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं।
वैसे तो, सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर नकेल कसना कोई  आसान काम नहीं है। फिर भी, इन साइटों को फिल्टर कर अपने गलत कंटेंट पर लगाम लगाने का मुदद्ा तूल पकड़ रहा है। 
इस निजी जानकारी की चोरी से बचने के लिए एक यही रास्ता अपनाया जा सकता है कि सोशल नेटवर्किंग करते समय इसके उपयोगकर्ता अपनी कोई भी निजी बात शेयर न करें। साथ ही, अपनी कोई भावना ज़ाहिर न करें जिसे सार्वजनिक रूप से करना किसी गलत तरीके से समझ लिया जाए। 
अपने प्रोफाइल पर अपनी निजी जानकारियों का कम से कम ब्यौरा देना चाहिए।
यदि कोई सूचना या निजी जानकारी दे भी रहे हैं तो सबसे पहले उस साइट और उसके टूल्स को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए। 
युवाओं को कोई भी सूचना देने से पहले ठीक से सोच लेना चाहिए कि यह आगे चलकर कोई मुसीबत न बन जाए।

Sunday, May 13, 2012

काटेवाड़ी- देश का पहला ‘ईको- विलेज‘















महाराष्ट्र के पुणे जिले की बारामती तहसील से 10 किमी. की दूरी पर एक छोटा सा गांव है, काटेवाड़ी। ये है देश का पहला ‘ईको- विलेज‘।
इस साफ सुथरे गांव में दस्तक देते ही सामने एक दीवार पर मोटे अक्षर की एक पक्ति आपका ध्यान खींच लेती हैं-‘समाज शक्ति हिच खारी राष्ट्र शक्ति होए‘ यानी समाज शक्ति ही राष्ट्र शक्ति है।
चलते-चलते अगर आप गांव में बने इन पक्के घरों की ओर देखें तो हर घर के दरवाजों पर महिलाओं के नाम ही दिखाई देंगे। ऐसा इसलिये है क्योंकि यह गांव पूरी तरह महिला प्रधान है।

काटेवाड़ी की ग्राम पंचायत में महिलाओं को शत- प्रतिशत स्थान दिया गया है। 15 महिलाओं का एक निर्वाचित समूह ही गांव से जुड़े सभी छोटे बड़े फैसले लेती हैं। पिछले एक दशक से इस गांव में महिलाओं के ही हाथ में सत्ता सौंपी गई हैं। इसके साथ ही आने वाले 5 सालों को भी पूरी तरह महिलाओं के लिये ही आरक्षित किया गया है।
यह देख बड़ा सुखद महसूस हुआ कि काटेवाड़ी के पुरूष भी बिना किसी भेदभाव के महिलाओं का इस क्षेत्र में स्वागत कर उनके साथ चलते हैं।
इस गांव की जनसंख्या लगभग 27,000 है। यहां रहने वाले हरेक किसान का व्यवसाय पूरी तरह प्र्यावरण से जुड़ा है। दशकों तक इस गांव के लोगों ने गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, अस्वच्छता और कई समस्याओं का सामना करना पड़ा है।
लेकिन पिछले एक साल में गांव का पूरा नक्शा बदल चुका है। इस गांव में हर घर में परिवारों के साथ खुशहाली भी साथ रहती है।

काटेवाड़ी गांव केंद्रीय मंत्री शरद पवार का जन्मस्थान भी है। इसलिये इस गांव की सूरत बदलने और नई उंचाइयों को छूने का जिम्मा शरद पवार की पुत्रवधू सुनेत्रा अजित पवार ने अपने हाथ मंे ले लिया है।
सुनेत्रा के नेतृत्व में गांववासियों ने  मिलकर एक टीम के रूप में काम किया है। यहां के बच्चों ने भी अपने माता-पिता की ही तरह खुद को गांव के प्रति समर्पित किया है। यहां उन्हंे ‘स्वच्छता दूत‘ कहा जाता है।
आज यहां के किसानों ने वैज्ञानिक तौर -तरीकों को अपनाकर अपना काम करना शुरू कर दिया है। अब गांव में ही कूड़े करकट और गोबर को कम्पोस्ट कर खाद तैयार की जा सकती है।
काटेवाडि़यों के वासियों के लिये गांव में ‘प्राथमिक आरोग्य केंद्र‘ नाम से एक अस्पताल खोला गया है। इस अस्पताल को हर संभव सुविधा से लैस किया गया है।
यहां महिलाओं की समस्याओं और रोगों के लिये विशिष्ट इंतजाम किये गये हैं। अस्पताल में गायनोाकोलाॅजिस्ट डाॅ. विजया सोलांकी ने बताया कि गांव की महिलाओं और लड़कियों के लिये टाॅल फ्री नम्बरों की सुविधा दी गई हैं जिससें वे कभी भी डाॅक्टरी सलाह ले सकती हैं।
हाल ही में, आरोग्य केंद्र में 250 महिलाओं को लैपटाॅप के प्रयोग का प्रशिक्षण दिया गया है। गांव में मोबााइल वैन के जरिये अस्पताल के कर्मचारी मलेरिया, डेंगू और मौसमी बिमारियों की जानकारी के साथ-साथ गर्भवती महिला और दो वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त टीके लगाये जाते हैं।
मेलों, बाजारों या हाट के दिन लोगों के पास जाकर उनके बीच स्वच्छता के उपाय व उपचार की जानकारी देना भी मोबाइल वैन के जरिये किया जाता है।

आर्थिक समृद्धि के लिये काटेवाड़ी के किसानों ने अपने पाॅल्ट्री फाॅर्म तैयार किये हुए हैं। जिनमें ‘ईमू‘ जैसे पक्षी का पालन मुख्य रूप से किया जाता है। जिससे किसानों को लगभग 15,000 रूपये प्रतिमाह की कमाई हो जाती है।
इस गांव के किसान इतने सक्षम हैं कि वे फसल, बीज और खाद का हर दिन  आॅनलाइन बाजार भाव देखते हैं।
काटेवाड़ी में किसानों के लिये एक लैबोरेटरी बनाई गई है जिसमें केसान अपने खेत से मिटटी लाकर उसकी उर्वरता की जांच करा सकता है। जिसके लिए किसान को 325 रूपये की राशि अदा करनी होती है। इस लैबोरेटरी मे मिटटी की जांच पूरी होने पर उन्हें एसएमएस के जरिये सूचना भेजी जाती है।
गौरतलब है कि बीत साल यहां मिटटी के लगभग 22,000 सैंपल लाए गये थे। यहां किसानों के लिये एक ‘किसान क्लब‘ बनाया गया है जिसमें उन्हें खेती में वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने की ट्रेनिंग दी जाती है।
काटेवाड़ी में किसानों की समृद्धि के साथ-साथ स्वच्छता पर भी जार दिया गया है। गांव के हर घर में शौचालय बनाया गया है। जिसे ‘आरोग्य मंदिर‘ नाम दिया गया है।
 यहां 2004 से पर्यावरण संतुलन के लिये पेड़ लगाकर अनवरत प्रयास शुरू किया गया है यहां अब तक 9400 पेड़ लगाये जा चुके हैं।
सचमुच! काटेवाड़ी अब देश के लिए एक ‘आदर्श गांव‘ बन चुका है। महाराष्ट्र सरकार ने 2008 में काटेवाड़ी को ‘माॅडल विलेज‘ घोषित किया है- ‘यहां सेवा नहीं उद्यम है खेती‘। देश की राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटील ने भीर सुनेत्रा पवार को गांव में अपने इस बेहतरीन योगदान के लिये प्रशंसा करते हुए काटेवाड़ी को ‘निर्मल ग्राम‘ बताया है।
यहां के किसान घर में ही गन्ने और अंगूर की खेती कर अच्छे दाम पा रहे है। किसान इंटरनेट से कनेक्ट हो कर बाज़ार भाव देख रहे है।
बारिश के पानी, गोबर गैस, शवदाह गृह से इकट्ठी की गई राख से भी बिजली पैदा कर रहे है।
और हा,ं इस गांव में किसानों के लिए ‘अॅग्रोवन‘ नाम से एक अखबार निकाला जाता है जो देश का पहला ऐसा अखबार है जो खेती पर ही आधारित है।
अगर आपको भी बारामती जाने का मौका मिले तो काटेवाड़ी के किसानों से जरूर मिलिएगा। एक टूटे- फूटे बदहाल गांव को इतनी खूबसूरती देकर उसके साथ चलकर काटेवाड़ी ने खुद को मील का पत्थर साबित किया है।  

Sunday, May 6, 2012

दूरदर्शन समेत आठ चैनलों पर दिखा `सत्यमेव जयते`




पिछले कई महीनों से चर्चा में रहे आमिर खान के शो सत्यमेव जयते का आज पहला एपिसोड दिखाया गया। जिसे दूरदर्शन समेत आठ चैनलों पर चार अलग-अलग भाषाओं में प्रसारित किया गया।

आमिर खान अपने इस शो में एंकर की भूमिका निभा रहे हैं।
इस शो के हर एपिसोड में एक थीम तैयार किया जाता है। आज के पहले एपिसोड का थीम `मां` रखा गया। इसमें उन महिलाओं को बतौर अतिथि बुलाया गया जो किसी किसी रूप से गर्भपात कराने के लिए प्रताड़ित हुई थीं।

इसमें इन महिलाओं से बातचीत के बाद भ्रूणहत्या और देश में घटते जा रहे लैंगिक अनुपात पर विशेषज्ञों और उस क्षेत्र में काम कर रहे बुद्धिजीवियों से भी राय ली गई।

हरियाणा में उन लोगों से भी बात कराई गई जो अधिक उम्र होने पर भी अविवाहित हैं क्योकि वहां लड़कियों की संख्या बेहद कम है। 
शो के अंत में कलाकारों द्वारा गाने की प्रस्तुति दी गई।

जो भी हो यह एक बेहतर शो कहा जा सकता है लेकिन ये भी झूठ नही है  कि  ये जिंदगी लाइव जैसा ही एक और शो आया है
इसमें जो अलग बात है वो ये है की इसे आमिर खान जैसे बड़े कलाकार द्वारा एंकर किया जा रहा है 



Saturday, April 21, 2012

टेलीविज़न के बदले-बदले अंदाज़...


वन्दना शर्मा
आज के दर्शक के लिए टेलीविज़न के मायने पूरी तरह बदल गए हैं। अब टेलीविज़न `चैटर बॉक्स` होने से काफी आगे निकल गया है। सेटेलाइट टेलीविज़न, केबल टीवी और डीटीएच से होते हुए अब यह `ऑनलाइन टेलीविज़न` यानी कि `इंटरनेट टेलीविज़न` तक पहुंच चुका है। एक डिब्बे से आगे बढ़कर दुनिया से हाथ मिला रहा है।
अब से पहले हमें टेलीविज़न देखने के लिए टीवी के साथ अपॉइंटमेंट लेनी पड़ती थी, एक विशिष्ट समय पर विशिष्ट प्रोग्राम के लिये। अब कम्प्यूटर स्क्रीन के ऊपर टेलीविजन देखने वाला व्यक्ति एक साथ कई काम करने में सक्षम है। वह एक ओर दुनिया के साथ सोशल नेटवर्किंग में फेसबुक या ट्विटर आदि के जरिए बाकी लोगों से जुड़ा होता है तो वहीं दूसरी ओर, उसी स्क्रीन से `इंफोटेनमेंट` कर रहा होता है। यानी इंफोर्मेशन लेने के साथ-साथ टीवी की दुनिया में भी पास रह सकता है।
अब यह कहा जा सकता है कि कम्प्यूटर एक मल्टीपल स्क्रीन का काम करने लगा है। एक सर्वे में यह पाया गया कि ऑनलाइन टीवी देखते हुए लगभग 22 फीसदी लोग फेसबुक पर यह शेयर करते हैं कि वे टेलीविजन पर कौन सा प्रोग्राम देख रहे हैं।
ऑनलाइन टेलीविजन से यह फायदा है कि इसमें डिजिटल पिक्चर के साथ-साथ आवाज भी अच्छी गुणवत्ता वाली होती हैं। जिससे आज टेलीविजन की मनोरंजन की दुनिया हमारी मुट्‌ठी में सिमट गई है जिसे हम अपने अनुसार समय में बांध सकते हैं। 
भारत में ऑनलाइन टेलीविजन को देखने के लिये इंटरनेंट प्रोटोकॉल टीवी (आईपीटीवी) की आवश्यकता होती है जिसके जरिये इंटरनेट, ब्रॉडबैंड की मदद से टीवी कनेक्शन घरों तक पहुंचाया जाता है। इसे सब्सक्राइब करना जरूरी है।
गौरतलब है कि सूचना के इस नये संसार में सबसे पहले एबीसी का `वर्ल्ड न्यूज नाउ` ऐसा कार्यक्रम था जो इंटरनेट पर प्रसारित किया गया।
यूरोप के 60 से अधिक देशों में आज ऑनलाइन टीवी के लगभग 2000 चैनल चलते हैं।
साल 2012 के 10 सबसे लोकप्रिय इंटरनेट चैनल के रूप में `हुलू` को चुना गया है। हर चैनल के अपने कंटेंट होते हैं। `हुलू` के कंटेंट को सबसे बेहतर माना गया है। दूसरे नंबर पर `अमेजन डॉट कॉम` को चुना गया है जबकि तीसरे पर `इंस्टेंट वीडियो` को। 
कहने का मतलब है कि अब दर्शक को टेलीविजन के `दास` बनकर नहीं रहना पड़ता है। इंटरनेट पर एक क्लिक के साथ आप टेलीविजन की दुनिया में से कुछ भी, जो आप चाहें-जब चाहें, देख सकते हैं। 
इन चैनलों पर कुछ नियम भी लागू कराये जाते हैं। जैसे कोई भी इंटरनेट चैनल किसी भी टीवी शो को अपनी मर्जी से प्रसारित नहीं कर सकता है। इसके लिये उसे कुछ `राइट्‌स` लेने होते हैं।
जैसे `हुलू` चैनल पर जो कंटेंट है उसमें बहुत कुछ है जो शायद इसलिये ही बेहतर माना गया है कि इसमें हर तरह के गाने, फिल्में और साथ ही लगभग 100 टीवी शो एक ही जगह पर हैं।
यदि आप दशकों पुराने सीरियलों को फिर से देखने के शौकीन हैं तो वह भी आपको यहां आसानी से मिल जाएगा। इसके अलावा स्पोर्ट्‌स, हैल्थ, एनिमेशन, डॉक्यूमेंट्री या अन्य किसी भी पसंदीदा विषय में देख-सुन  सकते हैं।
ऑनलाइन चैनलों में एक खास बात यह भी है कि किसी भी वीडियो, डॉक्यूमेंट्री या और किसी भी संबंधित कंटेंट को हम अपने किसी भी दोस्त के साथ साझा कर सकते हैं। दर्शक उसे अपनी ओर से रेटिंग यानी पसंद के अनुसार पहले दूसरे या तीसरे दर्जे का स्थान दे सकते हैं। किसी भी कार्यक्रम को सर्च कर कहीं भी उस तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। इसके साथ ही इसके पुराने एपिसोड भी देखे जा सकते हैं।
एक ओर यह हमें दशकों पुराने कार्यक्रमों से जोड़ता है  तो दूसरी ओर हमारे वक्त की बचत भी करता है। अब दर्शक को किसी भी धारावाहिक या आवश्यक कार्यक्रम के इंतजार में घंटों टीवी के सामने नहीं बैठना पड़ता।
इस वैज्ञानिक युग में नवीन तकनीकी आविष्कार को भी अन्य आविष्कारों के साथ जुड़कर चलना होता है। तकनीकी विकास के चलते मनोरंजन की दुनिया अब पूरी तरह दर्शक के हाथ में होने जा रही है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण एप्पल इंक ने प्रस्तुत किया है ।
दरअसल, इसे विस्तार देने के लिए एप्पल इंक एक ऐसा टेलीविजन बाजार में लाने की तैयारी में है जो दर्शक को उसकी इच्छा के अनुसार धारावाहिक या फिल्म को तत्काल देखने की सुविधा देगा। यह टीवी चैनलों के साथ-साथ ऑनलाइन दुनिया के साथ भी जुड़ा रहेगा। इसके दर्शकों को किसी रिमोट कंट्रोल की आवश्यकता नहीं होगी।
इसमें सबसे अच्छी बात यह है कि उपयोगकर्ता मोबाइल फोन, आइपैड या आवाज भी इससे नियंत्रित कर सकेगा। जबकि, दर्शक के पास इंटरनेट कनेक्शन होना भी इसके लिये जरूरी शर्त है।
हालांकि आम लोगों के बीच सबसे ज्यादा लोकप्रिय होने वाली वीडियो साइट यू-ट्‌यूब है जो दर्शकों को बिखरे हुए रूप में ही सही लेकिन इंटरनेट पर कार्यक्रमों के हिस्सों को उपलब्ध करा रही है। 
इस तरह के गैजेट्‌स के आ जाने से आज के युवाओं की जिंदगी के बदलाव अपने शबाब पर हैं। वह समय तो अब बिल्कुल जा चुका है जब पूरा परिवार हॉल में एक साथ बैठ टेलीविजन पर फिल्मों और धारावाहिकों का लुत्फ लिया करता था। एक ही टेलीविजन पर अलग-अलग कार्यक्रम देखने के लिये छोटी-छोटी लड़ाईयां हुआ करती थीं।
इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि ऑनलाइन टीवी  दर्शकों की टीवी पर निर्भरता को लगभग खत्म कर देगा।



Saturday, April 7, 2012

एप्पल आईफोन और आईपैड के बदले बेची किडनी


 

गेजेट्स आज लोगों के दिलो दिमाग पर इस कदर हावी हो रहे हैं कि इसके लिए वे कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं। ऐसा ही एक मामला चीन में सामने आया जिसमे एक किशोर ने एक आई-फोन का शौक पूरा करने के लिए अपनी किडनी ही बेच डाली।
बताया जा रहा है कि किडनी बेचने के बाद उसे जो पैसे मिले उनसे उसने एक एप्पल आईफोन और आईपैड खरीद लिया। यह मामले साल 2011 का है।
किशोर ने ऑनलाइन चैट रूम के जरिए अपनी किडनी का सौदा 22 ,000 युआन (3500 डॉलर) में कर डाला और अब किडनी फेल होने की दिक्कत से जूझ रहा है। उसने बिना माता पिता की सलाह के हुनान प्रांत में ऑपरेशन से किडनी निकलवा कर बेच दी।
चीन की स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, वहां करीब 15 लाख लोगों को सालाना ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है लेकिन केवल 10000 ट्रांसप्लांट ही हो पाते हैं। इस बड़े अंतर की वजह से अवैध तरीके से अंगों का कारोबार फल फूल रहा है।