Saturday, April 18, 2015

शादी, दुल्हों की बोलियां और दहेज


वन्दना षर्मा
षादी व्यक्ति के जीवन का सबसे यादगार लम्हा होता है। इस समारोह में परिवार, रिष्तेदार और मित्र एकत्रित हो आनंद उठाते हैं। खाना-पीना, नाचना-गाना, हंसी-मज़ाक के बीच सब संपन्न होता है और नया जोड़ा अपने दांपत्य जीवन की षुरूआत करता है। समाज में होने वाली हर षादी का फंडा यही होता है लेकिन देखते-देखते अब कई बदलाव आ गए। पहले, जहां षादी दो लोगों को एक सूत्र में बांधने के लिए होती थीं पर अब यह ‘स्टेटस सिंबल‘ बन चुकी हंै। जो परिवार जैसी षादी करेगा उसी के अनुसार उसकी हैसियत आंकी जाएगी। षादियां राजस्थान के किलों या महलों में जाकर की जाने लगी हैं। षादी समारोह में बनाए जाने वाले व्यंजनों की भी मानो बाढ़-सी आ गई है। दषक भर पहले तक उत्तर भारतीय षादियों के व्यंजन साधारण हुआ करते थे लेकिन अब प्रीतिभोज ‘दिल्ली हाट‘ जैसे प्रतीत होते हैं। यहां विदेषी व्यंजनों के साथ गुजराती, राजस्थानी, पंजाबी या दक्षिण भारतीय व्यंजनों का मजा उठा सकते हैं। केवल यही नहीं यहां ‘बार‘ और साकी का भी इंतजाम होता है। यह कैसी विडंबना है कि ऐसी पार्टी भी उसी देष में हो रही हैं जहां अन्नदाता हर दिन आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं। 
दूसरी ओर, वर और वधू पक्ष की ओर से महंगे कपड़ों, गहनों, साज-सज्जा पर किया जाने वाला खर्च भी कोई कम नहीं होता। यहां नई तकनीक व डिजीटलाइजेषन का सहारा लिया जाने लगा है। वहीं, बिजली की खपत एक ही रात में उतनी हो जाती है जितनी एक महीने में एक परिवार खर्च कर पाता है। इसी कड़ी में, घोड़ी पर सवार होने की जगह कुछ अजीबो-गरीब दूल्हे हेलिकाॅप्टर से भी अवतरित होते देखे गए हैं। हालांकि, ऐसा आगमन फिलहाल पाॅपुलर नहीं हो सका है।
दरअसल, इस तरह के षादी समारोह की मेजबानी करने में अच्छे-खासे बजट का होना पहली षर्त है जहां दहेज से लबरेज डोलियां उठाई जाती हैं। हालांकि, उच्च मध्यम वर्ग में भी ऐसा भव्य आयोजन किया जाने लगा है जिसका सीधा बोझ मध्यम वर्ग पर पड़ता है। मध्यम वर्ग में वर पक्ष की ओर से ‘बारात के अच्छे स्वागत‘ के नाम पर दबाव बनाया जाता है। एक प्रकार से यह आज के समय की दहेज पीड़ा है जो किसी न किसी रूप से वधू पक्ष को झेलनी पड़ रही है। हमारे समाज में आज भी डाॅक्टर-इंजीनियर दूल्हों की बोलियां लगाई जाती हंै। एक ओर तो, लड़कों की ही तरह लड़कियां भी उच्च षिक्षा प्राप्त कर अपने पैरों पर खड़ी हैं वहीं, पढ़े-लिखे समाज में भी दहेज की समस्या जस की तस बनी हुई है। एक अध्ययन के मुताबिक, बैंकों से अस्सी फीसदी कर्ज दहेज की मांग को पूरा करने के लिए लिये जाते हैं। यह भी एक कड़वा सच है कि भारत में हर घंटे दहेज एक नवविवाहिता दहेज की बलि चढ़ाई जाती है। दहेज के लालच में की जाने वाली हत्याएं न सिर्फ हत्याएं होती हैं बल्कि ये लंबी मानसिक-षारीरिक प्रताड़ना के बाद इस अंजाम तक पहुंचाईं जाती हैं। ऐसा भी नहीं है कि दहेज प्रताड़ना केवल मध्यम वर्ग के भीतर देखने को मिलती है बल्कि ऐसे भी मामले देखे गए हैं जहां दोनों ही पक्ष धनाढ्य हैं। 
कुछ समय पहले तक, अंर्तजातीय विवाहों पर परिवार असहमति जताते थे परंतु आज मान-मनौव्वल पर इसके लिए राजी होने लगे हैं इन षादियों को एक नया नाम ‘लव कम अरेंज्ड मैरिज‘ नाम दे दिया गया। फिर यहां भी दहेज समस्या खड़ी हो जाती है। हाल ही में, इस तरह के कई मामले सामने आए जिनमें अंतर्जातीय विवाह होने के पष्चात् लड़की को दहेज के लिए प्रताडि़त किया गया।
समाज का एक हिस्सा होने के नाते हम सभी को दहेज का विरोध करना होगा। हालांकि, विरोधस्वरूप, समाज में कभी एकजुटता नहीं देखी गई, विरोध में मुखर आवाज़ नहीं उठाई गई क्योंकि कुछ लोग इसे निजी फायदे के तौर पर देखते हैं। दहेज तब तक खत्म नहीं होगा जब तक इसकी मांग खत्म नहीं होगी क्योंकि जब कोई अपनी बेटी की षादी में दहेज देता है तो वह यही चाहेगा कि बेटे की षादी में उसकी भरपाई क्यों न की जाए फिर अगला परिवार भी यही चाहेगा और आगे यही लेन-देन कम ज्यादा होने पर इसका क्रूरतम रूप सामने आता है। देष में बड़े पैमाने पर हो रही कन्या भ्रूण हत्या का सबसे बड़ा कारण दहेज है जिसके चलते बेटियों को एक बड़े खर्च के तौर पर देखा जाता है। दहेज कुप्रथा को रोकने के लिए बने दहेज निशेध अधिनियम, 1961 में कई संषोधन किए जाने के बाद भी यह सामाजिक समस्या पैर जमाए हुए है। 
पढ़े-लिखे नौजवानों को भी यह समझना होगा कि यह हम सबकी जिम्मेदारी है कि षादी समारोह के दिखावे व दहेज के लेन-देन पर लगाम लगाकर सुखी दाम्पत्य जीवन को लक्ष्य बनाएं। हरेक समाज में महिलाओं को सम्मानजनक तथा उन्मुक्त जीवन जीने का अधिकार है।

Saturday, May 10, 2014

इस बार जो भी सरकार महिलाओं को मिले उनका अधिकार!'



लोकसभा चुनाव 2014 के चुनाव के प्रचार का आज आखिरी दिन है। वाराणसी में राहुल का रोड शो और पीछे चलती भारी भीड़।  चुनावों में इस बार महिलाओं को बहुत बढ़ावा दिया गया। नेता चाहे मोदी हो या राहुल—प्रियंका, सभी महिलाओं को एक बड़े वोटर के तौर पर देखने लगे हैं। उनकी सुरक्षा के मुद्दे, उनके अधिकारों और रोजगारों और सम्मान से जुड़े मुद्दों को अपने भाषणों में जगह दे रहे हैं। पार्टियों ने अपना महिला मोर्चा तगड़ा कर दिया है जो इन दिनों काफी सक्रिय दिखाई देने लगा है। स्थिति ऐसी है मानो साल 2014 में ही भारत में महिलाएं अवतरित हुईं हों। आकर उन्होंने कहा हो कि उन्हें भी एक वोटर के तौर पर देखा जाए। महिलाओं को जब नेता इतनी तवज्जो देते हैं तो फिर किसी भी शासन में महिलाओं के ​लिए संसद में 33 फीसदी सीटों के आरक्षण को लेकर आने में आगे क्यों नहीं आया।
पिछले दिनों 17वीं लोकसभा के कार्यकाल के अंतिम क्षणों में संप्रग ने महिलाओं के लिए आरक्षण के बिल पर मुहर लगगवाने की बात उठाई और वह पास नहीं हो सका। यह मात्र दिखावा था। अगर स​ही में ऐसा कोई कम उठाना था तो दस साल में क्या कोई ऐसा वक़्त नहीं आ सका कि महिलाओं के बिल पर चर्चा की जा सके। चर्चा तो की गई लेकिन ध्वनि मत का भी तो एक अन्य तरीका था जिससे महिलाओं को उनका हक़ मिल सके।
खैर, पार्टी कोई भी आए लेकिन आशा यही है कि 'इस बार जो भी सरकार महिलाओं को मिले उनका अधिकार!' महिलाओं को यदि 33 फीसदी का आरक्षण मिल जाता है तो राजनीति की आधी गंदगी अपने आप साफ हो जाएगी। ऐसा इसीलिए है कि अधिकतर नेताओं की छवि आपराधिक होती है, ऐसे में महिलाओं के बीच दुराचारी महिलाओं की संख्या नगण्य मात्र होती है। महिलाओं को उनके हक़ की आवाज़ को और उपर उठाने के लिए लगातार लड़ना होगा ताकि देश और जनता को सही रास्ता दिखाई देने लगे। 

Tuesday, February 4, 2014

'विश्व कैंसर दिवस': कैंसर के प्रति जागरूकता जरूरी



विश्वभर में चार फरवरी का दिन कैंसर दिवस के रूप में मनाया जाता है जिसका उद्देश्य कैंसर जैसी घातक बिमारी के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाना है। जब लोगों में जागरूकता होगी तभी वे इसके इलाज और बचाव के प्रति सजग हो सकेंगे।
विश्व कैंसर रोकथाम संघ की ओर से 2008 में चार फरवरी को 'विश्व कैंसर दिवस' के रूप में मनाए जाने की घोषणा की। जिसका प्राथमिक लक्ष्य 2020 तक कैंसर की बीमारी और इससे होने वाली मौतों में कमी लाना है।
यह एक चौंकाने वाला तथ्य है कि केवल भारत में ही हर साल 11 लाख कैंसर के नए मामले समाने आते हैं। इसके साथ ही, भारत में स्तन कैंसर और मुंह के कैंसर के मरीजों की संख्या में लगातार इजाफा देखा जा रहा है।

लोगों में भ्रम है कि कैंसर केवल वृद्धावस्था में ही हो सकता है जबकि ऐसा नहीं है। आजकल के  खानपान और बदलती जीवन शैली के चलते यह हर उम्र के व्यक्ति में देखा जाने लगा है। 
अकसर माना जाता है कि कैंसर जैसी बीमारी का अंत मृत्यु ही है लेकिन सच तो यह है कि समय पर यदि इसका इलाज कराया जाए तो फिर से सामान्य जीवन जिया जा सकता है।

इसके लिए आवश्यक है कि कैंसर के लक्षणों के प्रति सजगता बरती जाए। समयसमय पर चिकित्सक से जांच कराएं। तंबाकू का सेवन न करें। हरी सब्जियों को अधिक से अधिक अपने भोजन में शामिल करें। शरीर में किसी तरह के अचानक उभरे परिवर्तन को नज़रअंदाज न करते हुए चिकित्सक से परामर्श लें। यदि आप नियमित व्यायाम करें तो यह स्वास्थ्य के लिए सदैव हितकर है।

      

Sunday, September 29, 2013

जानें कैसे रहें महिलाएं सावधान...


वन्दना शर्मा

देश की राजधानी दिल्ली में इन दिनों महिलाओं के खिलाफ बढ़ते जा रहे अपराधों से यहां की महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस करने लगी हैं। आप सभी के देखते-देखते दिल्ली कैपिटल से रेप कैपिटल में तब्दील हो गई है। ऐसे में जरूरी है कि आप स्वयं ऐसे कदम उठाने के लिए तैयार रहें जिनसे अपराधियों का डटकर मुकाबला किया जा सके। उनके मंसूबों को नाकाम कर सकें। अक्सर देखा गया है कि अधिकतर अपराधी ऐसी महिलाओं को अपना शिकार बनातें हैं जिनका ध्यान अपने आस-पास के लोगों की हरकतों पर नहीं होता। इसी भटके हुए ध्यान का फायदा उठाकर मनचले इन वारदातों को अंजाम देने में कामयाब हो जाते हैं।
ऐसे समय में लड़कियों और महिलाओं को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वयं ही उठानी होगी ताकि आपके साथ कोई अनहोनी न हो। इसके लिए बस सतर्क रहने की जरूरत है और यह कोई मुश्किल काम नहीं है। थोड़ी सावधानी बरतने से आप एक सुरक्षित माहौल में अपना ख्याल रखने में सक्षम हो सकेंगी। हम आपको सलाह देतें हैं कि जब भी आप घर से बाहर  हों तो इन बातों का ध्यान जरूर रखें-

  •  महिलाओं को अपने साथ कोई न कोई ऐसा सामान अपने पास रखना चाहिए जिसका समय आने पर हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सके।
  •   किसी भी समय पार्किंग एरिया में अकेले न जाएं।
  •    जब आप ऑफिस से लौट रहीं हों तब उस कैब या ऑटो नंबर किसी करीबी तक जरूर भेजें।
  •  अपने आस-पास के माहौल को पहचानें और कुछ भी गलत महसूस होने पर वहां से तुरंत निकलने की कोशिश करें।
  •  यदि आपको महसूस हो कि कोई आपका पीछा कर रहा है तो इसकी सूचना पुलिस को तत्काल देने के साथ-साथ कोई ऐसी जगह देखें जहां आपकी मदद के लिए अन्य लोग हों।
  •  सड़कों पर चलते समय, बस में सफर करते समय, दफ़्तर से निकलते या कॉलेज से लौटते हुए यहां-वहां वातावरण का ऑबसर्वेशन करें।
  •  यदि आप किसी गलत रास्ते पर आ गईं हैं या फिर कहीं भटक गईं हैं तो हैरानी से यहां वहां न देखें जिससे कि किसी को उस जगह से आपके अंजान होने का पता चल जाए। ऐसे में आप किसी रिक्शा से किसी नजदीकी मैट्रो स्टेशन पहुंचने की कोशिश करें।
  •  किसी भी व्यक्ति से कार में लिफ्ट लेने से पूरी तरह बचें। यदि कोई जानकार है तो भी उस व्यथ्ति के सामने फोन पर अपने घरवालों से बात कर उसके साथ होने की बात कहें ताकि उसे इस बात का ख्याल रहे कि आपकी  जानकारी औरों को दे दी गई है।  
  •  यदि आपको किसी से रास्ता पूछना है तो उस व्यक्ति पर भरोसा न करें जो आपको उसी जगह साथ चलने या वहां पहुवाने की बात  कहे।
  •  बस में अकेले सवारी करने से बचें।
  •  दोस्तों के साथ उनके फ्लैट पर न जाएं और न ही दोस्तों के साथ एल्कोहल का सेवन करें।

  •  आजकल युवाओं में फेसबुक और अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर दोस्ती करने का प्रचलन बहुत बढ़ गया है। इन माध्यमों के ज़रिये बने दोस्तों से मिलने का प्रस्ताव कभी स्वीकार न करें। ऐसे लोग आपको फंसाने की जुगत भिड़ाने की फिराक में रहते हैं। यदि मुलाकात करना जरूयरी हो तो केवल सार्वजनिक स्थानों पर मिलना बेहतर होगा।

  •  सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर धमकियां या अश्लील मैसेज आने की बातें भी उभरकर सामने आईं हैं। ऐसी स्थिति आने पर पुलिस को इसकी जानकारी दी जाए जिससे पुलिस साइबर एक्सपर्ट की मदद से आरोपी को पकड़ती है। इससे किसी बड़े अपराध के होने से पहले ही उसे रोका जा सकता है।





Thursday, August 29, 2013

कितना कारगर होगा तेजाबी हमलों पर अदालत का फैसला




वन्दना शर्मा
हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने एसिड अटैक की शिकार लक्ष्मी की याचिका पर  फैसला सुनाया है कि अब दुकानों पर खुलआम तेजाब की बिक्री करना एक अपराध होगा। इसके लिए विक्रेता के पास लाइसेंस का होना जरूरी है और साथ ही 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को तेजाब नहीं बेचा जाएगा। अदालत के इन दिशा.निर्देशों से ऐसी उम्मीद जताई जा रही थी कि एसिड अटैक की हिंसक घटनाओं में अब कुछ कमी आएगी। लेकिन हालात अब भी जस के तस बने हुए हैं। इन वारदातों को अंजाम देने वालों के हौंसले आज भी उतने ही बुलंद हैं जितने की पहले थे। अदालत के इस फैसले को आए कुछ समय भी नहीं हुआ कि एसिड अटैक के मामले अब भी लगातार सामने आ रहे हैं। पिछले माह दो और मामले सामने आए जिनमें से एक में युवक ने एक नव विवाहिता पर  तेजाब से हमला कर जान ले ली और परिवार को जला दिया। इस मामले पर स्थानीय अधिकारियों ने बयान दिया कि इस घटना को एक आम अपराध के तौर पर लिया जाना चाहिए। जबकि दूसरे मामले में एक पुरूष ने एक शादीशुदा महिला से विवाह करने की इच्छा जताई और उसके मना करने पर उस पर तेजाबी हमला कर डाला।   इससे यह बात तो स्पष्ट है कि लोगों में कानून का डर नहीं है। अनुमानित आंकड़ों के अनुसारए देश में हर साल लगभग एक हजार महिलाएं एसिड अटैक की शिकार होती हैं। वहींए महिला आयोग के हैल्प डेस्क पर गत छह माह में ऐसी 92 शिकायतें दर्ज़ कराईं गईं। एक हालिया सर्वे के मुताबिकए एसिड अटैक का शिकार होने वाले लोगों में अस्सी फीसदी केवल महिलाएं ही हैं जबकि इससे भी ज्यादा चौंकाने वाला तथ्य यह निकला कि इनमें से 70 फीसदी शिकार ष्माइनरष् हैं।
अभी दिल्ली की मेधावी लड़की प्रीति राठी की मौत को ज्यादा समय नहीं बीता जब मुंबई में वह एक अंजान व्यक्ति द्वारा हमले की शिकार हुई और एक महीने तक जिंदगी और मौत के बीच जूझने के बाद आखिरकार मौत से हार गई। प्रीति की मौत सिर्फ एक मौत नहीं बल्कि हमारी नाकाम सुरक्षा व्यवस्था का सबब थी।     
गौरतलब है कि अदालत ने अपने फैसले में एसिड अटैक की पीड़िताओं को 3 लाख रूपये की मुआवज़ा राशि देने का आदेश दिया है हालांकिए अभी पीड़िता के पुनर्वास संबंधित कुछ स्पष्ट नहीं किया गया है। यह जरूरी है कि इस हमले का शिकार होने वाली महिलाओं को जल्द से जल्द क सुरक्षित माहौल दिया जाए। उन्हें ईलाज और जरूरी सर्जरी का खर्च मुहैया कराया जाए। लेकिन वर्तमान स्थिति ठीक इसकी उलट है। हमले की शिकार पीड़िता को चक्कर लगाने के बाद जो मुआवजा राशि मिलती है वह इतनी थोड़ी होती है कि इससे ईलाज करा पाना असंभव होता है।
एसिड अटैक एक ऐसी शारीरिक हिंसा और मानसिक शोषण है जो पीड़ित को पल पल मरने को मजबूर कर देता है। अदालत ने अपने फैसले में इस अपराध को एक गैर.जमानती अपराध बताया है जिसके लिए न्यूनतम सजा तीन साल तय की गई है। इसी के साथ अपराधी पर 50 हजार का हर्जाना भरना होगा।  
 जबकि फिलहाल एसिड अटैक को गंभीर अपराध की श्रेणियों में न रखते हुए आरोपियों को साधारण बेल पर छोड़ दिया जाता है। अपने इस कुकृत्य के बाद वे साल.छह महिने की साधारण कैद के बाद अपनी सामान्य जिंदगी जीने लगते हैं जबकि पीड़िता को पूरी जिंदगी अपने जले शरीर को छुपाते हुए बीत जाती है। जिससे पीड़िता को अपने शरीर में होने वाली तेज जलन को झेलने के अलावा चेहरे के दागों को साथ लिए चलना पड़ता है। पीड़ित की ज़िंदगी हमेशा के लिए पूरी तरह बदल जाती है। उन्हें लोगों के बीच जानेए उनसे मिलने में हीन भावना महसूस होने लगती है।
आखिर क्यों ऐसे अपराध करने के बावजूद इन आरोपियों को समाज स्वीकार कर लेता हैघ् एसिड को इस पुरूषवादी अमानवीय समाज में इन दिनों महिलाओं के खिलाफ इस्तेमाल किये जाने वाले हथियार के रूप में देखा जाने लगा है। अक्सर देखा गया है कि इस तरह के खतरनाक जानलेवा हमले का शिकार महिलाएं तब होती है जब वे किसी पुरूष की बात या एक तरफा प्यार को ठुकरा देती हैं। दरअसलए ये निर्दोष महिलाएं और लड़कियां उन पुरूषों के झूठे अहमए अपमान और हिंसा की बली चढ़ रही हैं जिसे वे अपने ठुकराए जाने पर बेइज्जती समझ बैठते हैं। ऐसी कई वारदातें सामने आ चुकी है जिनमें स्कूल और कॉलेज जाने वाली लड़कियों के चेहरे पर ब्लेड से हमला कर उसे बिगाड़ने की कोशिश की गई। क्यों पुरूष अपनी इच्छाओं के विरूद्ध जाते देख वह अपनी सहन शक्ति खो देता है। कई बार ऐसी ही स्थितियों का सामना महिलाओं को भी करना पड़ता है। फिर क्यों नहीं वह भी इस तरह एसिड या ब्लेड का सहारा ले किसी का चेहरा या जिंदगी को बिगाड़ देने का फैसला ले लेतींघ् सही मायनों में महिलाएं अपनी सभ्यताए विवेकए ब़ुद्धि और सहनशीलता का परिचय देते हुए इन्हें शांतिपूर्वक स्वीकार कर लेती हैं। पुरूषों को महिलाओं से ऐसी ही समझदारी की सीख लेना जरूरी है।
दरअसल, इस तरह के हमला कर किसी महिला को कुरूप बनाकर या उसकी जिंदगी बर्बाद करने वाले पुरुष मानसिक रूप से कमजोर होते हैं। इन्हें यह समझ नहीं आता कि इस स्थिति से कैसे निपटें। उनके दिमाग में हिंसा करने और बदला लेने की भावना घर कर जाती है और वारदात को अंजाम दे अपराधी बन जाते हैं। हमें अब ऐसे हल खोजने होंगे जिससे कि अन्य महिलाओं को इन तेजाबी हमलों की हिंसा से बचाया जा सके। जो महिलाएं इस हिंसा की शिकार हो चुकीं हैं उन्हें जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़े करने के लिए सुविधाएं मुहैया कराईं जाएं जिससे कि ये भी पहले की तरह मुख्यधारा में शामिल हों सकें।

Monday, August 12, 2013

दिल्ली बस दिलवालों की नहीं बल्कि सबकी है!

दिल्ली! दिल्ली बस दिलवालों की नहीं बल्कि सबकी है, दिल हो चाहे न हो। यहां हर दिन लाखों लोग ट्रेन से उतरते हैं कुछ लौटने को आते हैं तो कुछ बस जाने को। कुछ मैट्रो सिटी की चकाचौंध में काम की तलाश को आए तो कुछ अपने सपनों की पोटली लिए
भविष्य संवारने यानी पढ़ाई को। यहां स्वागत है सभी का।
फिर भी मुझे यहां आने वालों से एक शिकायत है। आप लोग अपने संस्कारों को इस यमुना नाम के नाले में क्यों बहा देते है। जो सीख कर आए हैं यहां आकर भूल क्यों जाते हैं। ऐसा सोचना कि 'दिल्ली का लाइफस्टाइल ही ऐसा है...' तो ये तो गलत है। आप खुद भी तो एक लाइफ स्टाइल रखते हैं वैसे ही क्यों नहीं रहते। उन्हें साथ लेकर चलना जरूरी है क्योंकि हर किसी का एक अस्तित्व है।
ये आपको याद रखना होगा कि आप देश के जिस भी हिस्से से रिश्ता रखते हों ये न भूलें, आप उस जगह को रिप्रेजेंट करते हैं। अक्सर लोगों को यहां ऐसा कहते सुना होगा कि 'फलां जगह के लोग तो होते ही ऐसे हैं..'। छोटे शहरों से बड़े शहरों का रास्ता इतना दूर नहीं कि यहां आने तक आप अस्तित्वहीन हो जाएं...चलें लेकिन संस्कारों के साथ। अकेले रहने का मतलब यह नहीं कि आपको कोई नहीं देखता, न कोई पूछता। यहां भी पूछा जाता है! जब फोन की घंटी बजती है और मम्मी—पापा बोलते हैं।
( उन सभी को सॉरी जिनके पास अस्तित्व जिंदा है।)

Friday, August 2, 2013

तुमसे सीखा है...

खुश रहना
मैंने
तुमसे सीखा है
हंसना
मैंने तुम्हारी मुस्काराहट से
सीखा है
दिए जलाना
मैंने तुम्हारी शाम से
सीखा है
सात रंगों को छूना
मैंने छांव से सीखा है
फर्ज़ तुम्हारा है
हमेशा
मुझे सीखाते रहो
खुश रहना जो
मैंने
तुमसे सीखा है...