Friday, December 30, 2011

i really miss my college days....


अपना college, out of campus था. Fashion में क्या है, ये देखने के लिए north campus जाना पड़ता था यानी shopping point  कमला नगर.  Classes हमारी 12 :30 तक over हो ही जाती थीं. कभी bunk किया तो निट्ठल्ले भी हो जाते थे. कुंद्रा mam और गिल sir, हमारी graduation के तीनों साल अपनी special classes के लिए पीछे दौड़ा करते थे. इसलिए अपनी class से ज्यादा मैं अपने बाकी friends की class में जाकर गप्पे मारती थी.
कभी घूमने का मन हुआ तो arts faculty में time pass होता था. भूख लगने पर mathematical dept. की canteen से Lunch करते थे. वहां बैठे अक्सर मुंह ताकते कुत्तों को कुछ खिलाना जरुरी लगने लगा था. College से घर जाते वक़्त stand पर DTC bus का wait करने के बहाने घंटो बैठे रहते. मुझे याद है अपने  college route पर पहली बार low floor आने से हम कितना exited हो गए थे. हम लोग पुरानी DTC में बैठने की बजाय low floor के last row में जाकर बैठते थे. अक्सर bus conducter हमें class teacher की तरह शोर सुनकर बार-बार चुप रहने को कहते थे. films देखकर लौटते हुए college के signal पर खड़ी
 मोटी traffic police(lady) को एक-दूसरे का future कहकर मजाक उड़ाना...बड़ा याद आता है. 

College
के december के महीने में project के लिए घंटों computer lab में बैठना पड़ता था. किसी दोस्त से लड़ाई होने पर एक  ही row में  बैठ उसके ही बगल में दूसरे से chating कर बुराई करना  बड़ा मजेदार काम था. हम लोग कभी-कभी computer lab या library में चोरी से lunch भी करते थेएक बार पकड़े जाने पर librarian को भी offer किया था तो भी उस खड़ूस ने बहुत डांटा था
january
की घने कोहरे वाली  सर्दियों मेंल्दी उठकर 9:00 बजे internal exams के लिए college पहुंचना खुद पर ज़ुल्म-सा महसूस होता था. College पहुँचते ही canteen में दोस्तों को sms कर बुलाकर coffee पिलाने के लिए मजबूर करने में बड़ा मज़ा आता था.
Internals
से छूटते ही बारी आती rocking... college fest की.... fest के दिनों में सभी किसी किसी तरह दूसरे college fest में घुसने  के जुगाड़ लगाते थे. कुछ के जुगाड़ लग जाते तो कुछ बाहर ही रह जाते थे.
अब आता march! हाय! March तो दिल जलाने वाला month होता था. मौज-मस्ती का सारा हिसाब चुकाना पड़ता था. Last moment में Syllabus देखने में बहुत बड़ा सा लगने लगता था. Exams के लिए सस्ती xerox की तलाश हर साल पटेल चेस्ट पर आकर ही ख़त्म होती थी. जितना कभी जिंदगी में नही पढ़ा होता उससे ज्यादा notes xerox कराने पड़ते. Library में अपने दोस्तों को पढ़ते हुए और अपना खस्ता हाल देख जलन होने लगती थी. हाँ... Class test और mam का insult करके जाना अपना सारा हाल बयां करने को काफी थे. Last moment यानी exam वाले दिन college का गुरुद्वारा और बाबाजी दोनों याद आते थे. बाबाजी के ही चमत्कार की आशा लेके ही बैठते थे hall में.
बारी result की आती थी तो वो होता ही कुछ shocking था. काफी इंतज़ार के बाद university इस department का result declare करती है.
होता ये था के अपना group सबसे better result यानी 60 % cross कर ही डालता था यानी एक बार फिर से पार्टी...!!.   

Name- vandana sharma
Batch- 2008-2011
Course- jouranalism & mass communication
College - Shri Guru Nanak Dev Khalsa College, Dev Nagar,Karol Bagh

एक व्यंग्य ...


                                         

गर्मी की तपती दोपहर। बस स्टैंड पर कुछ लोग लाइन लगा खड़े थे। सभी पसीने से लथपथ।
अचानक एक । बड़ी गाड़ी आकर रूकी, आवाज आई-‘‘जो भी 27 प्रतिशत में आते हैं, आकर बैठ सकते है''। खुद-बा-खुद 3 आदमी जाकर कार में बैठ गए और गाड़ी चल दी। बाकी खड़े यह देख और तपने लगे। किसी ने पूछा-‘‘भाई ये क्या हुआ?‘‘
पीछे से आवाज आई-‘‘अरे ये गाड़ी सोनिया और मनमोहन ने भिजवाई थी, जानते नही क्या? सुना है देश के पांच राज्यों में चुनाव होने को हैं।
दूसरा बोला-‘‘ये माजरा क्या है? बताइये तो सही।''
‘‘लो कर लो बात।''

अजी... जिन्हें अभी आपने जाते हुए देखा है न, वो चलते-फिरते लोग नहीं बल्कि वोट जा रहे थे। इन्हें यहां से सीधे ले जाकर बैंक में जमा कर दिया जाएगा।‘‘
‘‘बैंक में?‘‘
‘‘हां भाई बैंक में। सुनने में आया है के आजकल वोटबैंक की राजनीति ही की जाने लगी है।‘‘
कोई बोला -‘‘तो क्या हम यों ही धूप में खड़े पसीने पोंछते रहेंगे? हमारा कोई मोल नहीं?‘‘
‘‘सरकार की इसमें क्या गलती है? हम जो यहां खड़े रह गए हैं वो या तो सामान्य वर्ग से हैं या बहुसंख्यकों में से। अब सरकार किस -किसको और कितना लालच देगी यार?‘‘
एक झल्लाती-सी आवाज आई- ‘‘ओ भाईसाहब...मेरा नाम अशोक जैन है। मुझे क्यूं नहीं ले गये गाड़ी में बैठा के वो?‘‘
इतने में बलखाती सी एक डीटीसी बस आकर रूकी...
लोग तितर-बितर हो स्टैंड पर अदब से खड़े हो गए कि कहीं कोई किसी को बस चलानी न सिखा रहा हो और दादी-पोती से अगले हम न हों जाएं ...।
फिर क्या था। एक-एक कर सभी बस में ठुसकर अपने-अपने रास्ते हो लिए।