Friday, December 30, 2011

एक व्यंग्य ...


                                         

गर्मी की तपती दोपहर। बस स्टैंड पर कुछ लोग लाइन लगा खड़े थे। सभी पसीने से लथपथ।
अचानक एक । बड़ी गाड़ी आकर रूकी, आवाज आई-‘‘जो भी 27 प्रतिशत में आते हैं, आकर बैठ सकते है''। खुद-बा-खुद 3 आदमी जाकर कार में बैठ गए और गाड़ी चल दी। बाकी खड़े यह देख और तपने लगे। किसी ने पूछा-‘‘भाई ये क्या हुआ?‘‘
पीछे से आवाज आई-‘‘अरे ये गाड़ी सोनिया और मनमोहन ने भिजवाई थी, जानते नही क्या? सुना है देश के पांच राज्यों में चुनाव होने को हैं।
दूसरा बोला-‘‘ये माजरा क्या है? बताइये तो सही।''
‘‘लो कर लो बात।''

अजी... जिन्हें अभी आपने जाते हुए देखा है न, वो चलते-फिरते लोग नहीं बल्कि वोट जा रहे थे। इन्हें यहां से सीधे ले जाकर बैंक में जमा कर दिया जाएगा।‘‘
‘‘बैंक में?‘‘
‘‘हां भाई बैंक में। सुनने में आया है के आजकल वोटबैंक की राजनीति ही की जाने लगी है।‘‘
कोई बोला -‘‘तो क्या हम यों ही धूप में खड़े पसीने पोंछते रहेंगे? हमारा कोई मोल नहीं?‘‘
‘‘सरकार की इसमें क्या गलती है? हम जो यहां खड़े रह गए हैं वो या तो सामान्य वर्ग से हैं या बहुसंख्यकों में से। अब सरकार किस -किसको और कितना लालच देगी यार?‘‘
एक झल्लाती-सी आवाज आई- ‘‘ओ भाईसाहब...मेरा नाम अशोक जैन है। मुझे क्यूं नहीं ले गये गाड़ी में बैठा के वो?‘‘
इतने में बलखाती सी एक डीटीसी बस आकर रूकी...
लोग तितर-बितर हो स्टैंड पर अदब से खड़े हो गए कि कहीं कोई किसी को बस चलानी न सिखा रहा हो और दादी-पोती से अगले हम न हों जाएं ...।
फिर क्या था। एक-एक कर सभी बस में ठुसकर अपने-अपने रास्ते हो लिए।       
 
 
 

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