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Monday, October 29, 2012

एसिड अटैक की शिकार होती महिलाएं

चेहरे पर एक दाग लग जाता है तो उसे हम जल्दी से जल्दी साफ करने को दौड़ते हैं और तब तक बेचैन रहते हैं जब तक चेहरा पहला-सा नहीं हो जाता। ऐसे में उन लोगों की बेचैनी का अंदाजा लगाया जा सकता है जो ‘एसिड अटैक‘ का शिकार हो रहे हैं। इन दिनों ऐसी घटनाओं का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। लेकिन इनके खिलाफ ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।
एसिड अटैक के मामले केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी तेजी से बढ़ रहे हैं। दुनिया में ऐसे सबसे ज्यादा मामले हमारे ही पड़ोसी देश बांग्लादेश में पाये जाते हैं। इसके अलावा पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, कंबोडिया और कोलंबिया में भी ऐसी वारदातों को अंजाम दिया जा रहा है।
इन मामलों को गंभीरता से लेते हुए बांगलादेश की सरकार ने एसिड की खुली बिक्री पर रोक लगा दिया। और देखिए, सरकार का यह कदम इतना कारगर सिद्ध हुआ कि ऐसे अपराधों में लगभग 15-20 फीसदी तक की कमी आई गई। एक हालिया सर्वे के मुताबिक, एसिड अटैक का शिकार होने वाले लोगों में अस्सी फीसदी केवल महिलाएं ही हैं जबकि इससे भी ज्यादा चैंकाने वाला तथ्य यह निकला कि इनमें से 70 फीसदी शिकार ‘माइनर‘ हैं।
अक्सर देखा गया है कि इस तरह के खतरनाक जानलेवा हमले का शिकार महिलाएं तब होती है जब वे किसी पुरूष की बात या एक तरफा प्यार को ठुकरा देती हैं। दरअसल, ये निर्दोष महिलाएं और लड़कियां उन पुरूषों के झूठे अहम, अपमान और हिंसा की बली चढ़ रही हैं जिसे वे अपने ठुकराए जाने पर बेइज्जती समझ बैठते हैं। इन जानवर समान तथाकथित इंसानों को इस बात का ज़रा भी इल्म नहीं होता कि अपनी एक जि़द और नासमझी के पीछे वे किसी और की पूरी जि़ंदगी बर्बाद कर रहे हैं।
एसिड अटैक एक ऐसा हिंसक शोषण है जो किसी को भी तिल-तिल कर जीने को मजबूर कर देता है। जब शरीर के किसी हिस्से पर ऐसिड गिराया जाता है तो उस हिस्से की त्वचा के टीशू (ऊतक) नष्ट होकर जल जाते हैं। जिन्हें पहले जैसा होने में एक लंबा समय लग जाता है और कई बार वे इस लायक रह भी नहीं जाते कि फिर से उस अवस्था में लौट सकें। एक धीमी, लंबी और साथ ही महंगी प्रक्रिया के चलते इसका इलाज किया जाता है। इसके इलाज में होने वाली ‘री-कन्सट्रक्टिव थैरेपी‘ और प्लास्टिक सर्जरी का खर्च वहन करना आसान नहीं है। जिसमें कुछ-कुछ समय के अंतराल पर दर्जनों ऑपरेशन होते हैं। इसका इलाज भी सिर्फ कुछ महंगे और बड़े अस्पतालों में ही संभव हो पाता है। अक्सर पीडि़त की आंख या कान पर इसका सीधा असर होता है जिससे वह अपनी देखने या सुनने की क्षमता से पूरी तरह वंचित हो जाते हैं।
एसिड अटैक, शारीरिक और मानसिक हिंसा दोनों तरह का हमला है। जिससे पीडि़त को अपने शरीर में होने वाली तेज जलन को झेलने के अलावा चेहरे के दागों को साथ लिए चलना पड़ता है। पीडि़त की जि़ंदगी हमेशा के लिए पूरी तरह बदल जाती है। उन्हें लोगों के बीच जाने, उनसे मिलने में हीन भावना महसूस होने लगती है।
वहीं दूसरी ओर, एसिड अटैक को गंभीर अपराध की श्रेणियों में न रखते हुए आरोपियों को साधारण बेल पर छोड़ दिया जाता है। जबकि अब समय की यही दरकार है कि ऐसे जघन्य अपराध करने वाले अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए ताकि अन्यों को भी इससे सबक मिल सके।
हाल ही में, हरियाणा राज्य ने एसिड अटैक की पीडि़त महिलाओं के लिए राहत और बचाव केन्द्र तैयार किया है जिसके तहत पीडि़ता की देख-रेख, क्षतिपूर्ति, इलाज और इसके साथ ही अपना जीवन सुचारू रखने के लिए पांच लाख रूपये देने की घोषणा की है।
आखिर क्यों, सरकार इस बात पर ध्यान देने की बजाए कि दोषियों के साथ क्या किया जाए इस बात पर जोर डालती है कि अपराध होने पर पीडि़तों का क्या किया जाए? उसके लिए भी पीडि़तों को भी अपना हक नहीं मिल पाता और उन्हें एक बार फिर हुक्मरानों द्वारा शोषित किया जाता है। इसका एक उदाहरण उत्तर प्रदेश की अर्चना कुमारी के रूप में देखा जा सकता है जिसका शरीर पूरी तरह जल चुका है एक हादसे में अपनी एक आंख और कान को गंवा चुकी है फिर भी सरकार उस युवती से सबूतों की मांग कर रही है कि वह एसिड अटैक की शिकार हैं। उसके बाद ही सरकार उसे आर्थिक सहयोग दे सकेगी।
एसिड को इस पुरूषवादी अमानवीय समाज में इन दिनों महिलाओं के खिलाफ इस्तेमाल किये जाने वाले हथियार के रूप में देखा जाने लगा है। पिछले दिनों रांची के विश्वविद्यालय में लड़कियों के जींस पहनने के विरोध में उन्हें यह धमकी दी गई कि यदि वे जींस पहनेंगी तो उनके चेहरे पर तेजाब डाल उसे खराब कर दिया जाएगा। इससे पहले भी कुछ ऐसे ही किस्मकी वारदातें सामने आ चुकी है जिनमें स्कूल और काॅलेज जाने वाली लड़कियों के चेहरे पर ब्लेड से हमला कर उसे बिगाड़ने की कोशिश की गई। क्यों पुरूष अपनी इच्छाओं के विरूद्ध जाते देख वह अपनी सहन शक्ति खो देता है। कई बार ऐसी ही स्थितियों का सामना महिलाओं को भी करना पड़ता है। फिर क्यों नहीं वह भी इस तरह एसिड या ब्लेड का सहारा ले किसी का चेहरा या जिंदगी को बिगाड़ देने का फैसला ले लेतीं ? पुरूषों को महिलाओं से ऐसी ही समझदारी की सीख लेना जरूरी है। सही मायनों में महिलाएं अपनी सभ्यता, विवेक, बु़द्धि और सहनशीलता का परिचय देते हुए इन्हें शांतिपूर्वक स्वीकार कर लेती हैं।

Friday, October 5, 2012

हरियाणा: हजार पर केवल आठ सौ सतत्तर...

वन्दना शर्मा

हाल ही में दिल्ली की कुछ गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के साथ मुझे हरियाणा राज्य के कुछ क्षेत्रों में घूमने का अवसर मिला। हरियाणा राज्य का नाम लेते ही अनायास ही मन में यह बात सामने आती है कि यहां लिंगानुपात बेहद कम है। और यही गिरता लिंगानुपात देश और सरकार के लिए चिंता का विषय है।

‘सार्थक पहल‘ और ‘यूफाइवएमसी‘ नाम के ये संगठन इस राज्य के 365 गांवों की ऐसी महिलाओं को सम्मानित करने जा रहे हैं जिन्होने कन्या भ्रूणहत्या की भेड़ चाल को छोड़ अपने घरों में बेटी का स्वागत किया। इसकी एक पहल के रूप में इसे भी देखा जा सकात है कि पिछले महीने झज्जर के एक गांव मुंडखेड़ा में एक बच्ची के जन्म का उत्सव मानाया गया और साथ ही कन्या के लिए कुंआ पूजन भी आयोजित किया गया। हालंाकि यह कोई बड़ी बात नहीं होने के बावजूद खुद इस राज्य के लिए बड़ी बन गई क्योंकि हरियाणा में किसी कन्या के जन्म पर ऐसा पहली बार किया गया है। 


 इन संगठनों ने राज्य में ‘कन्या जन्मोत्सव‘ मनाने का संकल्प किया है जो देश की उन महिलाओं को भी सम्मानित करंेगे जो हरियाणा की ही बेटी हैं और एक ऊंचे मकाम पर पहुंच चुकी हैं।
साल 2011 में हुई जनगणना के आंकड़ों के अनुसार हरियाणा राज्य में 1000 लड़कों के ऊपर केवल 877 लड़कियां ही हैं। जबकि 2001 की जनगणना में यह आंकड़ा 861 का था। राज्य में आंकड़ों पर गौर किया जाए तो ये सचमुच चैंकाने वाले हैं क्योंकि एक दशक में केवल 1.86 फीसदी ही सुधार दिखा।
2011 के ही राष्ट्रीय आंकड़ों के मुताबिक, एक बार भ्रूण के लिंग के पता चलने के बाद सात लाख से ज्यादा कन्याएं जन्म के समय गायब हो जाती हैंजिनकी किसी को कोई जानकारी नहीं मिल पाती।
देखा जाए तो राज्य का एक तबका जो इसके प्रति थोड़ी समझ रखता है वह इसे कहीं न कहीं शर्मिंदा है। अब भ्रूण हत्या के प्रति आवाज उठाने की क्षमता रख रहा है। इसे राकना चाहता है। जागरूकता फैलाना चाहता है। हाल ही में, जुलाई महीने में यहां कन्या भ्रूण हत्या के चिंतन पर एक महापंचायत का आयोजन किया गया था जिसे स्वयं महिलाओं की ही अध्यक्षता में किया गया, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान की लगभग 200 खाप पंचायतों ने इसमें भाग लिया।
वहीं हरियाणा की एक ग्राम पंचायत ने कन्या को जन्म देने वाले परिवार को एक लाख रूपये का इनाम देने की घोषणा भी की है। कन्या भ्रूणहत्या  के खिलाफ उठाया गया यह एक बेहतर कदम हो सकता है। क्योंकि भ्रूणहत्या  एक हत्या ही है।
वहीं दूसरी ओर हरियाणा राज्य में पिछले चालीस दिनों में अब तक कई बलात्कारों के मामले सामने आ चुके हंै। जिनमें हरियाणा की हुड्ड्ा सरकार अपना मुंह सिले बैठी हुई है। राज्य में महिलाओं की असुरक्षा को भी एक मुददे के तौर पर साथ लेकर चलना होगा ताकि राज्य में पलने वाली बेटियों को सुरक्षित माहौल मिल सके।
हाल ही में हुए गीतिका हत्याकांड में भी सरकार ने कोई खास दिलचस्पी न दिखाते हुए गोपाल कांडा की कंपनियों को सूत समेत मुनाफा दे दोबारा खड़ा कर दिया। ऐसे में जरूरत है सरकार ऐसी हो कि अपनी जनता को हर संभव सहयोग दे। उसे जागरूक करे  और दोषियों को सजा दे सकें।
भ्रूण हत्या को रोकने के लिए राज्य की युवतियों और युवकों को यह जागरूकता का पाठ पढ़ाना होगा कि कैसे वे इस गिरते जा रहे लिंगानुपात को संतुलित  करने में योगदान दे सकते हैं। कन्याओं को भी समानता का अधिकार देकर अपना जीवन सुखद बना सकते हैं। राज्य की स्थिति को सुधार सकते हैं।
गौरतलब है कि हरियाणा राज्य की ही कुछ ऐसी भी बेटियां हैं जो आज विश्व में अपना नाम कमा चुकी हैं। विश्व की पहली पर्वतारोही महिला संतोष यादव जो दो बार माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई कर चुकी हैं, गीता ने राष्ट्रमंडल खेलों में 2010 में भारत के लिए पहली बार महिला कुश्ती में स्वर्णपदक अपने नाम किया।   
इसलिए राज्य को आज ऐसी कई ओर बेटियों की दरकार है जो देश के साथ- साथ जिंदगी को ऊंचाईंयों पर ले जा सके। और यह सच भी है कि जिस क्षेत्र में स्त्री की उन्न्ति नहीं है वहां किसी भी तरह की उन्नति की कामना करना मूर्खता है।


 

Monday, October 1, 2012

गांधी संग्राहलय में एक दिन ...

"आने वाली पीढ़ी को शायद ही यह यकीन होगा कि गांधी जैसा  भी कोई हाड़-मांस का पुतला इस धरती पर चला होगा" यह कथन विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइन्स्टाइन ने गांधी जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर  कहे थे. इस वैज्ञानिक के द्वारा कहे गए ये शब्द  आज सच लगते हैं.  
हाल ही में मेरा और मेरी एक मित्र का राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय  में जाना हुआ.  संग्रहालय में प्रवेश से पहले शान्ति देख लगा की बड़ा अनुशासन है. प्रवेश द्वार पर पर एक सन्देश लिखा था - "सत्य ही ईश्वर है". अन्दर जाकर पता चला की इतनी  बड़ी जगह पर दर्शकों के नाम पर सिर्फ हम दोनों ही हैं. वही पास में कुर्सी पर एक सुस्त महिला बैठी थी जो गांधी साहित्य की पुस्तकों के ढेर में कही खोई हुई जान पड़ रही थी. इस पुस्तकालय में करीब 40 ,000  पुस्तकें  और बहुमूल्य ग्रन्थ रखे हुए हैं . इसमें गांधीजी द्वारा दो दशकों से भी अधिक समय तक संपादित साप्ताहिक समाचार पत्रों का संग्रह  है. अनेक महापुरुषों के साथ किये गए पत्र-व्यवहार का भी एक संग्रह है . हालांकि ये कागज़  अब पीले पड़ चुके हैं .
दूसरे तल पर गांधी जी की भौतिक वस्तुओं का संग्रहण किया गया है . असाधारण  वक्तित्व द्वारा प्रयुक्त इन साधारण वस्तुओं को देखकर ही उनकी साधारण जीवन-शैली के बारे में पता चलता है . उनके द्वारा पढ़ी गई पुस्तकें, चरखे, औज़ार , घड़ी , कलम , छड़ी आदि का ये संग्रह बेहद सामान्य-सा लगता है . इन सभी के बीच गांधी जी का एक उपहार रखा दिखाई दिया , वो  था- 'गांधी जी के तीन बन्दर'. यह सफ़ेद संगेमरमर का बना है जो उनके एक चीन के मित्र ने उन्हें दिया था .इस उपहार के साथ एक कथन में लिखा भी गया है कि वे इससे इतने प्रभावित हो गए थे कि संपूर्ण जीवन उन्होंने इन बंदरों को अपना गुरु माना . 
यहीं एक फोटो गैलरी  भी है  जिसमे  गांधी जी के जीवन गाथा (बाल्यकाल से मृत्युपर्यंत) से जुड़ी लगभग 300 फोटो हैं. इसी तल पर एक 'महाबलिदान गैलरी' नाम की गैलरी है. यहाँ एक सन्देश लिखा गया है "मेरा जीवन ही मेरा सन्देश है" . यहाँ गांधी जी की अस्थियों का कलश , मृत्यु के समय पहने रक्त रंजित शाल और धोती एवं जान लेवा तीन गोलियों में से एक गोली(जो उन्हें लगी थी) को रखा गया है. यही अखबारों की कटिंग , मरणोपरांत  देश-विदेश के व्यक्तियों के सन्देश व गांधी जी के प्रिय भजनों को भी पढ़ा जा सकता है .
यहाँ गाँधी जी के बारे में जानने के लिए बहुत कुछ है लेकिन दुखद यह रहा कि इक्के-दुक्के दर्शकों के अलावा कोई नही आता. इन संग्रहालयो  में  यहाँ लिखे संदेशों को पढने वाला कोई नहीं है . आज की युवा पीढ़ी पर इन्हें जाकर पढने और देखने का ज्यादा समय भी नही है. वे ज्यादा से ज्यादा वक़्त फेसबुक  और ऑरकुट के साथ  बिताने लगे हैं. हम लोग ही इन्हें देखना नहीं चाहते तो इन संग्रहालयों के होने  का मतलब ही क्या हैअगर आप इस देश और अपने पूर्वजों द्वारा दिए गए इन मूल्यों और आदर्शों को मानते हैं तो एक बार आप तो जरूर जाएँ .