Friday, June 8, 2012

विकलांगता बनाम विकलांग व्यवस्था




विकलांगता एक ऐसी अवस्था का नाम है जो मनुष्य को शारीरिक या मानसिक स्तर पर अक्षम बनाती है. भारत में विकलांगों का प्रतिशत स्पष्ट नहीं है. 2001 के सरकारी आकंड़ों में इनकी संख्या 2 .17 करोड़ बताई गई, जबकि स्यवंसेवी संगठनों और मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय ने इनकी संख्या 10 करोड़ तक बताई है. विभिन्न सरकारी और गैरसरकारी आकंड़ों में इतना बड़ा अंतर दर्शाता है कि जब विकलांगों कि गणना ही ठीक से नहीं कि जा सकी तो उनके लिए सुविधाओं का क्या हिसाब हो सकता है ? इन्हें मूलभूत आवश्यक सुविधाओं भी नहीं मिल पाती. कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं इनका भला करने आती हैं तो उनमें से कुछ आशा किरण होमबन जाती हैं . सरकार द्वारा दी गई सुविधाओं में दशकों से कोई बदलाव कि जरुरत नाहिंन समझी गई.
यदि विकलांगों के कल्याण के लिए कुछ कार्य किए जाते हैं तो वो अमीरों द्वारा दया या कृपा भाव से ही किया जाता है. समाज के इस हिस्से को दया या कृपा से अधिक एक ऐसे सहयोग कि जरुरत है जो उन्हें मुख्य धारा से जोड़ सके. आमतौर पर विकलांगों को सार्वजनिक स्थानों जैसे स्कूल, कॉलेज, सिनेमा हॉल आदि में हेय दृष्टि से देखा जाता और कहा जाता है कि इन्हें इन सबकी क्या जरुरत है? आज विकलांग व्यक्ति अपनी विकलांगता से अधिक विकलांग व्यवस्था से पीड़ित है. संवेदनहीन व्यवस्था के कारण एक विकलांग व्यक्ति को जीवन के हर मोड़ पर मनोवैज्ञानिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है. जो उसे अपनी विकलांगता से भी अधिक परेशान करती है.
समाज को इस सन्दर्भ में अधिक परिपक्व होने कि जरुरत है. इसके लिए ब्लैक, तारे ज़मीन पर या इक़बाल जैसी फिल्मों या नाटकों का प्रसारण किया जाये जिनसे समाज को ऐसी किसी अक्षमता या विकलांगता से ग्रसित लोगों की भावनाओं और समस्याओं को समझाया जा सके और इससे स्वयं विकलांग भी प्रेरित और प्रोत्साहित होंगे.
दूरदर्शन ने सबसे पहले मूक बधिरों के लिए समाचार का प्रसारण शुरू किया था जो आज भी जारी है. आज जब खबरिया चैनलों की बाढ़ सी आ चुकी है तब भी किसी अन्य चैनल ने ऐसी कोई पहल करने की कोशिश नहीं की. सरकार को इस सम्बन्ध में न सिर्फ खबरिया चैनल बल्कि मनोरंजन चैनलों को भी आवश्यक निर्देश जारी करने चाहिए की वे विकलांग लोगों के लिए कार्यक्रम बनायें. इसी प्रकार नेत्रहीनों को स्कूलों या कालेजों में कम्प्युटर या ब्रेल लिपि आदि में लिखने पढने और काम करने का प्रसिक्षण दिया जाए. देखने में अक्षम लोग बोलने में सक्षम होने के बावजूद वे सामान्य रूप से वाद-विवाद, चर्चा या अन्य क्रियाकलापों के लिए आगे नहीं आ पाते. इन्हें रेडियो, टी.वी. पर बोलने के साथ-साथ अच्छे लेखन का प्रशिक्षण देकर इनकी प्रतिभाओं को दिशा दी जा सकती है.
ऐसे बच्चे जो आंशिक रूप से अंधे हों उनके लिए सामान्य बच्चों की तरह ही कविता, कहानियां और कार्टूनों की किताबें तैयार की जानी चाहिए. उनमें बड़े अक्षरों में लिखा जा सकता है जिसे पढने में वे सक्षम हों. लेकिन इस और ध्यान ही नहीं दिया जाता. बल्कि आंशिक रूप से अंधों को भी समाज में अँधा मान लिया जाता है.
भारत में विकलांगों के लिए तकनिकी उपकरणों का विदेशों की तुलना में औद्योगिक रूप से अभाव है. शारीरिक विकलांगों के लिए स्वचालित व्हीलचेयर्स का निर्माण कम दामों में अधिक मात्रा में करना होगा. स्कूल, कॉलेजों, शौचालयों या सार्वजनिक वाहनों में विकलांगों के लिए विशेष सुविदाह्यें होनी चाहिए ताकि वे स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बन सकें. इन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए कंप्यूटर, सिलाई, कधी, टाइपिंग, लेखन कार्य, आपरेटर जैसे बैठे रहकर कर सकने वाले कार्यों के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए . इनसे जुड़े प्रसिक्षण गृह बनाये जाने चाहिए .
कई बार बसों के इंतज़ार में खड़े नेत्रहीनों को भी लोग धक्का देकर आगे निकल जाते हैं, लोगों को इस रवैये से बाज आना होगा . सरकार को इसे दंडनीय अपराध के तौर पर देखना चाहिए . समाज को इन लोगों को समझने की कोशिश करनी चाहिए. यूनेस्को के अनुसार ये विकलांग या अक्षम नहीं बल्कि स्पेशल गॉड गिफ्टेडहैं.
हमें एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जो विकलांगों को उपकृतकरने के बजाय उनमें आत्म-विश्वास, आत्म-गौरव का भाव पैदा कर सके . विकलांगों के प्रति समाक का सकारात्मक दृष्टिकोण इस दिशा में पहला सर्वाधिक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है .

4 comments:

  1. सचेतक आलेख

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  2. बेहद सार्थक लेख

    आभार
    अनु

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  3. धन्यवाद अनु जी!:)

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