Friday, June 8, 2012

बदरंग होती ठिठोली


मीडिया का वर्चस्व भारतीय समाज में निरंतर अपना जाल बुनता जा रहा है. एक वक़्त ऐसा भी था जब घरों में टेलीविजन होना एक बड़ी बात होती थी. फिर लगभग इसके एक दशक बाद ही सभी घरों के शोकेस में टेलीविजन ने अपनी जगह पक्की कर ली. घरों में टीवी की पहुँच के बाद बारी आई केबल टीवी की, फिर तो केबल के बिना टीवी अधूरा लगने लगा. जब केबल टीवी से कार्यक्रमों के प्रसारण होने लगे तो सभी औद्योगिक-राजनीतिक (आश्चर्यचकित न हों) घरानों ने अपने-अपने चैनल ताश के पत्तों की तरह दर्शकों के आगे बिछा दिए.
समय के साथ तकनीकी विकास ने नये-नये कीर्तिमान स्थापित किए जो नई-नई कंपनियों के डीटूएच यानि डायरेक्ट टू होम और थ्री डी के रूप में हमारे सामने आये. आज जितने कार्यक्रमों के चैनल हैं उतने ही चैनलों पर ठिठौली भरे कार्यक्रमों की बाढ़ ही आ गई है. ये अलग-अलग होते हैं फिर भी इन सभी पर मजाक का केंद्र या विषय महिलाओंको ही बनाया जाता है. महिलाओं को ही केंद्र में रखकर भद्दे और अश्लील मज़ाक किए जाते हैं. इन कार्यक्रमों मेंऑडियंसबनकर आये लोग अश्लील मज़ाकों पर खुश होकर सीटी बजाते हैं और तालियाँ पीटते हैं तो कुर्सी पर बैठे जज अपनी कुर्सियों पर उछलने लगते हैं और दस-दस नंबर भी देते हैं. भारतीय समाज पुरुषसत्तात्मक समाज होने के कारण ऐसी अश्लीलता को स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं करता. महिलाओं को बुरा लगता है तो भी वे इसे केवल मजाक सोचकर बैठ जाती हैं.
टीवी पर प्रसारित एक ठिठौली के कार्यक्रम लाफ्टर चैलेंजमें कलाकार राजू श्रीवास्तव ने अपनी एक प्रस्तुति में एक दक्षिण भारतीय की नक़ल करते हुए कहा कि दक्षिण भारतीय फिल्मों में 7-8 रेप के बिना उसमें मज़ा नही आता. लड़की का बचकर भागना और उसके पीछे गुंडों का भागना ऐसा संघर्ष देखकर फिल्म अच्छी लगती है.इसके साथ ही वो अजीबो गरीब करतब करके भी दिखाते हैं. अन्य कलाकार भी मरदाना कमजोरी, सेक्स और साथ सोना आदि जैसे अन्तरंग विषयों पर मजाक बनाते हैं. एक अन्य कार्यक्रम कॉमेडी सर्कसमें होस्टिंग कर रही लड़की को बहुत छोटे कपड़ों में बुलाया जाता है और अधिकतर मजाक उसके काम कपड़ों और अर्धनग्न शरीर पर ही दिखाए जाते हैं जबकि यह मना जाता है कि ये कार्यक्रम सभी वर्गों के लिए बनाये जाते हैं.
अब प्रश्न ये उठता है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय समाज की मानसिकता को ख़राब करने वाले ऐसे कार्यक्रमों के प्रसारण पर क्यों ऊँगली नहीं उठता ? अश्लीलता की हद पार कर रहे इन कार्यक्रमों पर कोई सीमा क्यों नहीं तय की जाती ? समाज में दोयम दर्ज़े की मानी जाने वाली स्त्री जातिक्यों समाज के लिए मजाकका विषय बने जा रही है ? महिला कल्याण एवं विकास मंत्रालय इस ओर ध्यान क्यों नहीं देता ?

3 comments:

  1. सही कहा आपने ये प्रोग्राम बिलकुल पारिवारिक नहीं रहे

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  2. हमराय होने के लिए धन्यवाद वर्मा जी!

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