Wednesday, March 23, 2011

कभी तो याद करें...

आज स्वतन्त्र भारत का सपना अपनी आँखों में सजोंकर हंसते-हंसते मौत को गले लगाने वाले उन वीरों का बलिदान दिवस है, जिन्होंने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों से  अंग्रेजों की नींव हिलाकर रख दी थी। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव भारत माता के इन तीनों पुत्रों को अंग्रेजों द्वारा भले ही फांसी देकर मार दिया गया हो लेकिन इनके द्वारा जलाई गयी क्रांति की ज्योति आज भी प्रत्येक भारतवासियों के दिलों में अमर है।

23 मार्च,1931 यानी आज के ही दिन इन क्रांतिकारियों को सांडर्स हत्याकांड में मौत की सजा दी गई थी। राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह को फांसी देने के मुद्दे को अंग्रेजों ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। अंग्रेजों को डर था कि यदि ये तीनों जीवित रहे तो भारत से अंग्रेजों का बोरिया बिस्तर कभी भी उठ सकता।

भगत सिंह को सिर्फ उनके बलिदान के कारण ही महान नहीं माना जाता है बल्कि उनके जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं की ओर देखें तो बाल्यकाल से ही उनकी देशभक्ति की मिशाल हमें देखने को मिलेगी। यह कहा जाता है कि जब भगत सिंह 12 वर्ष के थे उसी वर्ष 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग़ काण्ड हुआ। इस काण्ड का समाचार सुनकर भगतसिंह लाहौर से अमृतसर पहुंचे। देश पर मर-मिटने वाले शहीदों के प्रति श्रध्दांजलि दी तथा रक्त से भीगी मिट्टी को उन्होंने एक बोतल में रख लिया, जिससे सदैव यह याद रहे कि उन्हें अपने देश और देशवासियों के अपमान का बदला लेना है। भगत सिंह ने ही क्रांति के उद्दघोष 'इंक़लाब जिंदाबाद' उक्ति का निर्माण किया जो पूरे स्वतंत्रता संग्राम में अंत तक दोहराया जाता रहा।

भगत सिंह ने हमेशा यही कहा कि वे मुझे मार सकते हैं, मेरे विचारों को नहीं। वे मेरे शरीर को ख़त्म कर सकते है मेरी आत्मा को नहीं। राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह ने 23 मार्च 1931 को हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया और भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अमिट हो गए। अंग्रेजों ने इन क्रांतिकारियों के प्रति भारत के जनमानस में उमड़े समर्थन के डर से फांसी के लिए मुकर्रर तारीख से एक दिन पहले ही उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया।

यह भी माना जाता है कि जन रोष से डरी सरकार ने 23-24 मार्च की मध्यरात्रि ही इन वीरों की जीवनलीला समाप्त कर दी और रात के अंधेरे में ही सतलुज के किनारे उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया। 24 मार्च को यह समाचार जब देशवासियों को मिला तो लोग वहां पहुंचे, जहां इन शहीदों की पवित्र राख और कुछ अस्थियां पड़ी थीं। देश के दीवाने उस राख को ही सिर पर लगाए उन अस्थियों को संभाले अंग्रेज़ी साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेने लगे।

भगतसिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है। लेकिन इस देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा की यह नौजवान पीढ़ी स्वतन्त्र भारत में जन्मी हैं जो जानना भी नही चाहती कि ये आज़ादी हमे कितने बलिदानों के बाद नसीब हो पाई। यह आज विडम्बना का विषय बन गया है की हम उन्हीं वीरों की भूमि पर रहते हैं और उनका बलिदान दिवस कब आता है यह भी याद नही रख पाते।

समाचार पत्रों में आये नेताओं की बड़ी फोटो के साथ राजनैतिक विज्ञापनों, कैलंडर या कही से चलते हुए एसएमएस के आने से ही हमें ऐसा पता चल जाता है। बहुतेरों को तो पता भी नही चलता पर कोई  फर्क नही पड़ता। अखबारों में कोई बुद्धिजीवी भी अपनी कलम से  ऐसे विषय पर कुछ लिखना नही चाहते। जब हम अपने आदर्शों को भी याद नही रख पा रहे हैं तो इस पीढ़ी का भविष्य किस ओर जा रहा है यह एक सोचनीय विषय है? चलिए हम तो इन वीरों को नमन करें!

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