Thursday, March 24, 2011

आरक्षण नही कौशल हो....

इस वर्ष के रेल बजट को पेश करते हुए रेल मंत्री ममता बनर्जी  ने उन लोगों से अपील की थी जो रेल की पटरियों को  रोक कर खड़े हो जाते हैं और परेशानियां पैदा करते  हैं. इनकी वजह से रेलवे को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है.
भारत में सभी को अपनी अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्रता दी गई है इसका प्रयोग सभी जितना हो सके उतना करने भी लगे हैं . यह प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व की बात है कि वह अपना और देश का भला जानने लगा है .पर उसे यह समझ नहीं अता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित? जाट समुदाय द्वारा किया जा रहा लगातार इस तरह का विरोध प्रदर्शन उन्हें सरकारी नौकरियों में आरक्षण  दे ना दे पर आम जनता को भारी परेशानियाँ जरूर दे रहा है. उन्हें यह क्यों नहीं पता कि  कारों में  घूमने वाले हुक्मरानों को किसी ट्रेन के रुक जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता. फर्क तो उन्हें पड़ता है जो घंटों अपना काम छोड़ ट्रेन में बैठकर रास्ता खुलने की बाट जोहते हैं, होली पर अपने परिवार वालों से भी नही मिल पाते हैं.
जाट समुदाय के सरकारी नौकरियों में आरक्षण की बात करें तो यह आरक्षण की मांग करने का गलत तरीका तो है ही. यह मांग शांतिपूर्ण तरीकों से भी तो की जा सकती है. फिर क्यों ये लोग खाट बिछाकर कभी पंजाब -भटिंडा,चंडीगढ़  तो कभी दिल्ली- फरीदाबाद की ट्रेनों को रोककर खड़े हो जाते हैं. समुदाय की औरतें भी अपना चूल्हा- चौका लेकर यहाँ अपना विरोध प्रदर्शन कर रही हैं .

कभी गुर्जर- जाट तो कभी अन्य समुदायों का इतना विरोध करना बाकियों को भी यही रास्ता अपनाने के लिए उकसा रहा है.जिससे अशांति का माहौल पैदा हो जाता है. जाटों के लिए यही बेहतर होगा कि वे अपनी योग्यताओं पर ध्यान दे ना कि रेल की अलग -अलग पटरियों पर. हांलाकि हाई कोर्ट ने यह कह दिया है कि इन आन्दोलनकारियों के  खिलाफ सख्त कदम उठाये जाएँ ताकि ऐसी घटनाएं दोबारा न हो सकें. इस पर जाटों ने यह धमकी भी दी है कि यदि इनकी मांग नही मानी गई तो उनका दूसरा पड़ाव दिल्ली मुंबई की पटरियों की ओर होगा .
केंद्र और लगभग सभी राज्यों में सरकार ने जितना अधिक लाभ दिया जा सकता है आरक्षण देकर उतना दिया भी गया है. नौकरियों में इतना अधिक आरक्षण दिया जा चुका है कि सभी इस लालच के शिकार हो रहे हैं .यदि इन्हें आरक्षण दिया जाता है तो सामान्य वर्ग में रह कौन जायगा ? जो रह जायगा वो इतना उपेक्षित होकर नही रह पायगा और अपने आरक्षण के लिए भी आवाज़ उठायगा. एससी/ओबीसी/एसटी और अल्पसंख्यकों के नाम पर इतना आरक्षण देखकर लगता है कि सामान्य वर्ग होना एक अयोग्यता है. यह सामान्य वर्ग के छात्रों को तब महसूस कराया जाता जब अखबारों में खबर दी जाती हैं कि एडमिशन ख़त्म हो चुके है बची हुई सीटें  चाहें तो सामान्य वर्ग के छात्र आकर ले लें.

यदि आपके पास कौशल और योग्यता है तो आरक्षण की आवश्यकता ही क्या है? नौकरी चाहिए तो भूख हड़ताल ओरों को परेशान करने से क्या लाभ? सरकार इस तरह के आरक्षण देने में अक्षम है तो सिर्फ इसका रास्ता यही है कि कौशल को आगे लाने के लिए कदम उठाये जाएँ ताकि कोई पीछे ना रहे.शिक्षा व्यवस्था बेहतर कि जाए. और जिन्हें आरक्षण की आवश्यकता अब नही है स्थिति अच्छी है. उन्हें आरक्षण देना बंद करे. जो लोग आरक्षण के लाभार्थी हैं उनकी स्थिति देखी जाए कि उन्हें इसकी आवश्यकता है भी या नहीं . सरकार को अपना पुराना चश्मा उतारकर देखना होगा कि हर सामान्य वर्ग में आने वाला व्यक्ति या परिवार आर्थिक रूप से सुद्रढ़ नहीं होता और न ही हर निम्न वर्ग का परिवार गरीब.   

1 comment:

  1. आपकी बात सही है लेकिन वोट बैंक की राजनीति ने देश की समस्याओं को बढ़ने का काम किया है.
    आपकी बात से मैं पूर्णतया सहमत हूँ.

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