Sunday, October 23, 2011

सताता है नॉस्टेल्जिया

मेरे एक पत्रकार मित्र हैं.अक्सर साथ बैठकर यहाँ -वहां की बातें  होती रहती हैं. एक दिन यूँ ही बातों -बातों में कुछ इस तरह की बातें शुरू हुईं कि मुझे उस पर कुछ लिखने की उसे समझने की इच्छा हुई. शायद दिल्ली में रहने के कारण मेरा उन मनोभावों को समझ पाना बड़ा मुश्किल सा है. मेरे जिस मित्र की बात मै आपको बता रही हूँ काशी यानी शिव की नगरी से दिल्ली में पत्रकार हैं. हर एक इंसान की तरह उन्हें भी अपनी मातृभूमि से बड़ा  प्रेम है. मैंने एक दिन काशीदर्शन करने की इच्छा जाहिर की. अधिक उत्सुकता में डूबकर उन्होंने गूगल से मुझे सारी जानकारी परोसने  की कोशिश शुरू कर दी .साथ ही काशी व्याख्यान भी देते गए. उनकी वो उत्सुकता देख मेरे मन में विचार आया. हम जिस भूमि (दिल्ली) पर रहते हैं वहां आपका परिवार भी साथ है. हर दिन आप अपना काम ख़त्म करके घर लौट आते हैं शाम अपने परिवार के साथ बिताकर थकान उतार सकते हैं. इसी भूमि पर  पर कुछ और लोग भी रहते हैं लेकिन अपने परिवार से दूर.........मीलों दूर. वे एक दिन की छुट्टी ले ना तो परिवार से मिल सकते हैं और न ही लौट सकते हैं.
इसी तरह और न जाने इस बड़े शहर में कितने लोगों को परिवार का नॉस्टेल्जिया सता रहा है. अपनी प्रतिभा साथ लिए दूर आकर बस गए हैं. उन्हें उनकी राखी कलाइयों पर नहीं लिफाफों में बंद मिलती हैं.उनके साथ मजबूरी है के छोटे शहरों में अवसर नही मिल पाते, उस तरह के विकल्प नही मिल पाते जो उन्हें यहाँ रहकर पाते हैं.शायद हर कदम पर इनके साथ-साथ एक कहावत इनका पीछा करती चलती है जहां आप कुछ पा रहे हो वहां कुछ खो रहे हो.............यही एक कारण बना है की शहरों में खालीपन अकेलापन बढ़ने लगा है. युवाओं में डिप्रेशन की समस्या पैदा हो गई हैं.जहां सूचना क्रांति से लोगों की दूरी घटी हैं वहीँ मध्यम वर्ग के परिवारों  दूरियां कम हुईं हैं पर ख़त्म नहीं.यहाँ यह समझना भी जरूरी है के हमे कुछ समय बाद यानी दशकों के बाद जब हम किसी स्थायित्व को अपना लें अपनी अपनी भूमि पर लौट जाना चाहिए. जो भूमि हमारी है.जिस पर हमने जन्म लिया.वही हमें बार-बार बुलाती है.

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