Sunday, May 13, 2012

काटेवाड़ी- देश का पहला ‘ईको- विलेज‘















महाराष्ट्र के पुणे जिले की बारामती तहसील से 10 किमी. की दूरी पर एक छोटा सा गांव है, काटेवाड़ी। ये है देश का पहला ‘ईको- विलेज‘।
इस साफ सुथरे गांव में दस्तक देते ही सामने एक दीवार पर मोटे अक्षर की एक पक्ति आपका ध्यान खींच लेती हैं-‘समाज शक्ति हिच खारी राष्ट्र शक्ति होए‘ यानी समाज शक्ति ही राष्ट्र शक्ति है।
चलते-चलते अगर आप गांव में बने इन पक्के घरों की ओर देखें तो हर घर के दरवाजों पर महिलाओं के नाम ही दिखाई देंगे। ऐसा इसलिये है क्योंकि यह गांव पूरी तरह महिला प्रधान है।

काटेवाड़ी की ग्राम पंचायत में महिलाओं को शत- प्रतिशत स्थान दिया गया है। 15 महिलाओं का एक निर्वाचित समूह ही गांव से जुड़े सभी छोटे बड़े फैसले लेती हैं। पिछले एक दशक से इस गांव में महिलाओं के ही हाथ में सत्ता सौंपी गई हैं। इसके साथ ही आने वाले 5 सालों को भी पूरी तरह महिलाओं के लिये ही आरक्षित किया गया है।
यह देख बड़ा सुखद महसूस हुआ कि काटेवाड़ी के पुरूष भी बिना किसी भेदभाव के महिलाओं का इस क्षेत्र में स्वागत कर उनके साथ चलते हैं।
इस गांव की जनसंख्या लगभग 27,000 है। यहां रहने वाले हरेक किसान का व्यवसाय पूरी तरह प्र्यावरण से जुड़ा है। दशकों तक इस गांव के लोगों ने गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, अस्वच्छता और कई समस्याओं का सामना करना पड़ा है।
लेकिन पिछले एक साल में गांव का पूरा नक्शा बदल चुका है। इस गांव में हर घर में परिवारों के साथ खुशहाली भी साथ रहती है।

काटेवाड़ी गांव केंद्रीय मंत्री शरद पवार का जन्मस्थान भी है। इसलिये इस गांव की सूरत बदलने और नई उंचाइयों को छूने का जिम्मा शरद पवार की पुत्रवधू सुनेत्रा अजित पवार ने अपने हाथ मंे ले लिया है।
सुनेत्रा के नेतृत्व में गांववासियों ने  मिलकर एक टीम के रूप में काम किया है। यहां के बच्चों ने भी अपने माता-पिता की ही तरह खुद को गांव के प्रति समर्पित किया है। यहां उन्हंे ‘स्वच्छता दूत‘ कहा जाता है।
आज यहां के किसानों ने वैज्ञानिक तौर -तरीकों को अपनाकर अपना काम करना शुरू कर दिया है। अब गांव में ही कूड़े करकट और गोबर को कम्पोस्ट कर खाद तैयार की जा सकती है।
काटेवाडि़यों के वासियों के लिये गांव में ‘प्राथमिक आरोग्य केंद्र‘ नाम से एक अस्पताल खोला गया है। इस अस्पताल को हर संभव सुविधा से लैस किया गया है।
यहां महिलाओं की समस्याओं और रोगों के लिये विशिष्ट इंतजाम किये गये हैं। अस्पताल में गायनोाकोलाॅजिस्ट डाॅ. विजया सोलांकी ने बताया कि गांव की महिलाओं और लड़कियों के लिये टाॅल फ्री नम्बरों की सुविधा दी गई हैं जिससें वे कभी भी डाॅक्टरी सलाह ले सकती हैं।
हाल ही में, आरोग्य केंद्र में 250 महिलाओं को लैपटाॅप के प्रयोग का प्रशिक्षण दिया गया है। गांव में मोबााइल वैन के जरिये अस्पताल के कर्मचारी मलेरिया, डेंगू और मौसमी बिमारियों की जानकारी के साथ-साथ गर्भवती महिला और दो वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त टीके लगाये जाते हैं।
मेलों, बाजारों या हाट के दिन लोगों के पास जाकर उनके बीच स्वच्छता के उपाय व उपचार की जानकारी देना भी मोबाइल वैन के जरिये किया जाता है।

आर्थिक समृद्धि के लिये काटेवाड़ी के किसानों ने अपने पाॅल्ट्री फाॅर्म तैयार किये हुए हैं। जिनमें ‘ईमू‘ जैसे पक्षी का पालन मुख्य रूप से किया जाता है। जिससे किसानों को लगभग 15,000 रूपये प्रतिमाह की कमाई हो जाती है।
इस गांव के किसान इतने सक्षम हैं कि वे फसल, बीज और खाद का हर दिन  आॅनलाइन बाजार भाव देखते हैं।
काटेवाड़ी में किसानों के लिये एक लैबोरेटरी बनाई गई है जिसमें केसान अपने खेत से मिटटी लाकर उसकी उर्वरता की जांच करा सकता है। जिसके लिए किसान को 325 रूपये की राशि अदा करनी होती है। इस लैबोरेटरी मे मिटटी की जांच पूरी होने पर उन्हें एसएमएस के जरिये सूचना भेजी जाती है।
गौरतलब है कि बीत साल यहां मिटटी के लगभग 22,000 सैंपल लाए गये थे। यहां किसानों के लिये एक ‘किसान क्लब‘ बनाया गया है जिसमें उन्हें खेती में वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने की ट्रेनिंग दी जाती है।
काटेवाड़ी में किसानों की समृद्धि के साथ-साथ स्वच्छता पर भी जार दिया गया है। गांव के हर घर में शौचालय बनाया गया है। जिसे ‘आरोग्य मंदिर‘ नाम दिया गया है।
 यहां 2004 से पर्यावरण संतुलन के लिये पेड़ लगाकर अनवरत प्रयास शुरू किया गया है यहां अब तक 9400 पेड़ लगाये जा चुके हैं।
सचमुच! काटेवाड़ी अब देश के लिए एक ‘आदर्श गांव‘ बन चुका है। महाराष्ट्र सरकार ने 2008 में काटेवाड़ी को ‘माॅडल विलेज‘ घोषित किया है- ‘यहां सेवा नहीं उद्यम है खेती‘। देश की राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटील ने भीर सुनेत्रा पवार को गांव में अपने इस बेहतरीन योगदान के लिये प्रशंसा करते हुए काटेवाड़ी को ‘निर्मल ग्राम‘ बताया है।
यहां के किसान घर में ही गन्ने और अंगूर की खेती कर अच्छे दाम पा रहे है। किसान इंटरनेट से कनेक्ट हो कर बाज़ार भाव देख रहे है।
बारिश के पानी, गोबर गैस, शवदाह गृह से इकट्ठी की गई राख से भी बिजली पैदा कर रहे है।
और हा,ं इस गांव में किसानों के लिए ‘अॅग्रोवन‘ नाम से एक अखबार निकाला जाता है जो देश का पहला ऐसा अखबार है जो खेती पर ही आधारित है।
अगर आपको भी बारामती जाने का मौका मिले तो काटेवाड़ी के किसानों से जरूर मिलिएगा। एक टूटे- फूटे बदहाल गांव को इतनी खूबसूरती देकर उसके साथ चलकर काटेवाड़ी ने खुद को मील का पत्थर साबित किया है।  

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